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Full text of "रामकी उपासना"

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ः मं 
रामकी उपासना: 
+7>बै+€९+ 


उपासना 


युयोध्यस्मण्जुहराणमेनी,.. 
भूपिष्ठां ते नम उक्ति विधेम ॥ 
».. (यंजु० ४०९८) 
एड़ें टेह़ी बांकी ये चाढाकियां सब । 


रहें ढाल तलवार इक आपही अब ॥ 

आपको देवके पास विदा! उपासना है।.. अबवा पाक 
उम्र अवस्थाका नाम है, जहां रोम रोममें राम रम जांये, मन 
अप्षतों भींग जाये, दिल प्रह्मानादमें' डूब 'भोये'।' इसके तीन 
दरने हैं, जैसे पत्यरकी शि त्रका गद्बामें शीवक हो. जाता, कपड़े" 
की गुड़ियाका- अस्दर बाहर जत्में निचुड़ने छा जाना, और 
म्रिसरीक्षी ' ढह्लीका गंगोरूप हो .जाना। फ्मी-कम्ती भजन, 
ध्यान, आराधना, अतुपत्थान आदि भो इसोफ़ों कहते हैं। सादी 
बोलंचातमों इधरकी याद ( स्मरण ) करना भी उपासवा है। 

खबरदर भूछे न पाये । जि! 


, फ्रयव्मुणयन्यृशन्जिश्ननमसनत्गच्छन्लपतबसन्‌ 
॥। 


अटल नियम--पाठक | बहुत बातोंसे क्या हाभ!  एकही 
हिसते हैं, भाचरंगें लाकर परवाठ लो, ठीक न.दो'तों उसके 
हाथ फाट देवा और लिहा निकाह, डालना, जुरों कान खोदकर 
सुत के और दितकी आंखे खोलकर पढ़, छो--वो़े; छमें 


कूदकर नीचे तगिरना तो शायद हो भी सके, परूतु जगवके 
किपी पदार्यकी चाहमें पड़कर फ्लेशसे, ढुःखते घच जाता कमी 
नहीं हो सकता। सूर्भ इश्य होनेपर भी प्रद्राश ने फैडे, यह तो 
कद्ाचित हो भो जाय, पर हृत्यमें पवित्त भाव और प्रह्मनन्द 
दोनेपर भी शक्तिप्री आदि भानो' हमारों पाती भरनेवाढी दासी 
नहो जाय॑, दो नहीं सकता, कमी नहीं । सीनारपर चढ़कर 
चोट पुकार दो 
'सत्यमेव जयते नाजृतम्‌। सर्ल्य ज्ञानमनन्तं अहम 
बह सत्य कया है ९ * 
“तमेबैक जानथ आत्मानमन्या वाचोविमुअ्चथ! ॥ 
-.. अुण्ह० 
बस इक आत्लज्ञान है अमरित रसकी खान! 
जार बात बक़ वक वचन झक झक मरना जाव॥' 
नान्यः पन्‍्था विद्यते उयवाय ॥ 
जञालातेमत्युमेत्येति नान्‍्यः पंथा. विद्क्तये । 
सृत्यो+ स सृत्युमाप्तोति थ हह नानेव पह्यति॥ 
असस्तेव सभवति अप्तदजहोति वेद चत्‌। 
अस्तिवृक्षेति चेद्देद सन्तमेन॑ तो. बिहुः॥ 
* कमी ने छूटे पीड़ दुःखसे जिसे वक्षका ज्ञान महीं॥ 
जे चर राम नाम लियो नाहीं । 
ते नर खर छूकर भरकर सम दथा जियें जग माही॥ 
डर उन्नाच सूत सुहच्छत गनियत गुन गढआई। - 
विन हरि भजन इँदानके फुल तजत नहीं करुआई ॥ 


उपासनाकोी आवश्यकता , ३ 


नरक +आ>+>2 >> प++ २७ रमन 44०न+भ न «७७०५ >+9प०लभ ५-२ ३-७ फार+ कक अमर 4प 8७/७०/७००० का, 
सो गति जरि जाय कथा नहिं रामकी 
पिन खेतीके वाद भला केहि कामकी ॥| 
“जो नयन कि वेनीर हैं वेनूर महे हैं” ॥ 
त्र्क्य - 
आत्मान॑ रथिन विद्धि शरीरं रथमेव हु 
बुद्धि तु सारोथें विद्धि मनः अग्रहमेव च ॥ 
शरोरूपी वागीमें बैठकर जोबात्माको वृद्धिहपी साईसद्रारा 
मनी छगाम डोरीसे, इन्द्रियोंके घोड़ोंको द्वांको-हांकते, आखिर 
जाना कहां है !“तद॒विष्णोंः परम॑ पदम” । 
त्थ्यतों प्रक्म है; श्र साक्षात्कार बगैर सरेगी बहों, 
सनाह्मह॒ष्टि दुःख रूप है। खुशी खुशी ( उत्साहपूंक ) 
पित्ततें स्‍्नेश् मोह आदि रखते हो ९ भेव्या | काहे नागकों गोद- 
में दूंव पिझ पिछाकर मत पाछो। सत्यखरूप एक परमात्माको 
छोड़ और फोई विचार मनमें रखते हो? बन्दृककी गोली 
कल्लेजेमें क्यों नहों मार छेके, मांगें कशांतक्क डेरे.डालोगे, 
रास्तेमें कह्नंतकक मिहमानियां खाओगे, सरायमें मां नहीं बैंठी 
अुई है। भाराम अगर चाहते हो तो चलो रामके धामसें। 
उपासनाकी आवश्यकता 


यस्त्वविज्ञानपान्भवत्ययुक्तेन मनत्ा सदा। 
तसेद्धियाण्यवश्यानि दुशख्ा इव सारथे: ॥ 
विज्ञाव रहित; अबुक्त मनवाड़े मतुष्यद्यो इस्द्रियां बिगड़े 
हुए धोढ़ेकों तरह मंमिल्तक पहुँचतां वो कहां, रथको ओर 
रथमें बैठेका कुँझओ और यढ़ोंें ना गिरती हैं, जय रोना और 
दांत पीसना होता है, यदि इसी जन्पके घोर रोखसे बचना इंट 
हो वो :घोड़ोंको सिधावा और छोथी राहपर चल्ना रूपी 








छ सम्रकी उपासना 





ध्यमनियम'की आवश्यकता है। पर छा. यल्न क्र देखो, जबतक 
सुम्हाा साईस _ ( सासथी) छुल्वडी आंखोंवाला कोट 
है वबतक कीचड़में डूबोगे, रेतमें घस्ोंगे, गढमें गितेगे, चोर 
खाओगें, और चित्झमोरें।- वावा |-सांसारिक बुद्धिको सारथी 
बनाना दुःख ही दुःख पाना है ।- अब वात छुनो, फतह ( जय ) 
* इसीमें 'हैकि अपनी. मम रूपी वायडोरी दे दो, दे दो उस ऋष्णके, 
हाथ, बल अब कोई खतरा नहीं, वह इस संखाररूपी कुरुकेंज्रसे 
जयके . साथ: छेंद्री: निकलेगा ! रथ हाँकनेमें प्रसिद्ध लाई है? हद 
_'आवश्यक्रताःई हरिको स्थ.घोड़े वायडोरियांँ सब कुछ सॉपकर 
पास विठानेकी अर्थात्‌.डंप्रासनाकी .) : 

. :सेत्रे घर्मान्यरित्यज्य सासेके शरणं ब्रज ) 

अब स्व स्ने फर्पेस्यो मोक्षयरिष्यामि मा झुचः ॥ 

*संगात्लेजायते. कामः * कांमात्कोघोइसिजायते” पदार्थे- 

कामना ओर _ विपयवालनासे सर्वसाघधारणको वही “यति 
होती है जो जछमें पड़े हुए तुम्बेकी आंधीके अधीन होगी। ऐसे 
अंनर्थका एंकमात्र कारण विषय तो हर वक्त पास रहे ओर इस 
रोगकी निवारक ओषधि ( उपासना, आत्मानुखन्धान ) कभी रू. 
की जाय तो ऐसी मात्मद॒याक्षे बदले अवश्य 





, अछुयो नाम वे छोका अन्धेच तमसाइवा-- 


में दारुणा छुःख खहने दी पड़ेंगें। यदि कांटोपर पड़ जानेसेः 
परमेश्वर याद आता हो; तो प्यारे जब॒ देखो कि संखारके काम 
धस्थॉमें उलफ़कर राम भूछने छगा है; ऋंटपट अपनेकों “ नकीे. 
ऋॉर्टेपर , गिरां दो और छुछ नहीं दो पीड़ाके चंद्ाने वह चाद्‌ 
आ ही जायेगा; परदेमें रोना, दिलकों पीटता, छिपकेर डार्ढे. 
भास्नां भी अवध्य फ़ायदा करेगा।. ह॒ 


उपासना दो प्रकाकी.* ५ 
उपासना दो प्रकारकी 
प्रसिद्ध है-अतीक और अहंग्रह 
प्रतोक उपासनामें चाहरके पदाथोंसे दृष्टि हृठाइर पह्ाको 
देखना होता है। अहंग्रह उपासनामें अपने अन्दर जो जहंता 
अमृता भौजूद है उससे पहा छुड़ा अहम ही प्रह्म देखना होता दै। 
यदि बाहरफ़े पत्वीकको सत्य जानकर ईश्वरकी कल्पना उसमें 
की जाय तो वह ईइवर उपासनाका एक जह्ढ, मूत्तिंपूला था 
“्युतपरस्तों” है, इसीपर व्यासजीफे पर्मप्तीमांसा-दर्शेनके अध्याय 
४ पद १ सूत्र ५ में यों आज्ञा की है-- 
प्र्नदश्रत्कर्पात्‌। 
सर्थात्‌ प्रतीकमें प्रद्मरष्टि हो, ब्रद्ममें प्रतोकभावता मत करों । 
और अहंग्रह उपासताके सम्बन्धमें थों लिखा है।-- 


आत्मेतितृपगच्छीन्त ग्राहयन्ति चे ॥ 


प्रह्यमीमांसा १५ २, ३। 
अथोत्‌ प्रह्यको अपनी आत्मा ( अपने आए ) धारस्वार चिस्तन 
करो। वेदका भी यही मत दे ओर यहद्दी उपदेश। इन 
प्रकारकी उपासनाओंमें अभिप्राय ओर लक्ष्य एक ही है । वह क्‍या 
है, जानते हो १ 
सर खस्विद अ्क्ष, तज्जलानिति शान्त उपांसीत । 
* छं0 उप0 
ठंढी छातीसे अन्दर बाहर अद्मही वक्ष देखो। 
अथ खलु ऋतुभयः घुरुषः | 
पुरुषका जैसा विचार और चिल्तन रहता है चसा ही बह 
काठान्तरमें हो जाता है; तो त्रद्मचिन्तत ही फ्थों न रह किया 





छः . * शामकी उपासना 


हि किन जर लक जल > पशतक तह सकल मल 
ज्ञाय--अर्थात्‌ अपने आपको अद्यरूपही _ क्यों न देखते रहे। 
इसीपर आतिका बचन दै--“अल्ाविद्‌ जह्मेव भवति ।? 
अहंग्रह. ओर प्रतीक दोनेंसें नामरूप (बुंत) संसारको 
छोड़कर धीरे धीरे ब्रह्मकी ओर बढ़ना इष्ट होता है, बुतका बनाना 
नहीं । जछ ब्रह्म है, स्थल ब्रह्म है, पवन ब्रह्म है, आकाश ्रद्य 
है, गंगा श्रह्म दै--इत्यादि प्रतीक उपासनाका रूपदर्शक वाक्यों- 
में जल,  पवच, आकाश जादिके साथ ब्रह्मको कहीं जोड़ना 
( संकलन करना ) नहीं है। जैसे यह खर्प काला है । इससे यह 
अथे निकछ्ठा है कि यह वस्तु (१) सपे है ओर ( २) फाला है। 
किन्तु यहां तो बाघ समानाधिकरण दै। , जैसे यदि यह 
कहें कि यह सर्प रस्खी है, तो यहां रस्सी काले रंगकी तरह 
सर्पेके साथ समान सत्तावाली नहीं है, किन्तु रस्सी ही है, से 
नहीं। इसी तरह सच्ची उपासना वह है कि घारारूप जल- 
हृष्ठिमें न रहे, प्रह्म चित्तमें समा जाये। स्पन्दरूप पनहृष्टिसे 
गिर जाय, ब्रह्मसत्तामात्रही भाव हो, प्रतिमामें प्रतिमापन छड़ 
ज्ञाय, 'चैतल्य स्वरूप भगवानकी मांकी हो। जैसे किसी प्रेमके 
मतवाले घायरने प्यारेका प्रेमपत्र पढ़ा, उसकी दृष्टि तो प्यारेके 
स्वरूपले भर गयी, अब पत्र किसको दीख पड़े, गोपियां उद्धलसे 
कहती हैं---यह पाती अब कहां रखें, छांत्रीसे लगाती हैं तो जलन - 
जायेगी, भंखोंपर धरती हैं तो गल जायेगी। पपासनामें 
एकदम भग्न होनेके लिये इन्द्रिय-ज्ञान तो सायब हो जायेगा। 


प्थारेने का ्ि बस्तुवः कोई पा नहीं है, प्यारेही- 
का घेस्तुझप ६। इ्सो हरह सब इस 
प्यारेकी छे डछाड्रूप प्रतीत होगा । 5402000% 


8 पवन डुमक ठुमक, लाई घुरावा श्यामका । 
भाई बपासना तो इस्रीका नाम है जिसमें जुबानका तो 
डिलना क्‍या, शारीरकी हड्डी ओर चाड़ीतक्के एक एक परिमाणु दिल 


हपफासना दो प्रकारकी ७ 


22 8: 2:00 0 200 0020 20227 

जायें। यह नहों तो आंध्र मूदो, चाक मूंदो, कान मूदो, सुख 
मद, गावो चादे चिह्ओ। तुम्हारी उपासना बल एक चित्ररूप 
है, जिसमें ज्यन नहों। बड़ा सुन्दर चित्र सदी, रविवर्माका 
मान लो, पर जाज्ञी तप्तत्रोर हो तो है। फिर उसमें क्या धरा है । 

पदार्थामें इस बअम्रदृष्टिकों ढूंढ निकालना और विपय- 
भावनाफों एकदम मिटाफ़र ब्रद्माहद्भी उपासनामें छााना कुछ बेसा 
अध्याग्रेप ( कल्पना ) शक्तिको चहाना ओर बरतना न जान छेचा 
जैसा शतरंजमें काठके टुकड़ोंकों बादशाह, वज्जीर, हाथी, घोड़ा, 
प्यादा मान छेते हैं। जल ब्रह्म है, माराश त्रह्म है, प्राण त्रह्म है, 
झील प्रह्म है, मन तद्म दे, इत्यादि उपासनाके रूप तो 
मिटाऋर वस्ठु भावनामें जमाते हैं। यदि यह खाली मान लेना 
ओर ऋलपनाभात्र भी हो तो वैसी फव्पना दे, जैसे बालक गुरुणी- 
के कऋहनेसे गुणा करने और भाग देनेकी रीतिको मान छेता है। 
भाग देने गुणा करनेकी यह विधि फ्यों ऐसी है ओर क्यों नहीं 
इस रीति द्वारा उत्तके ठीक आ जानेमें कारण क्‍या है, ये 
यातें तो पीछी आयेंगी, जब बीजगणित ( अलुजबरा ) पढ़ेंगा। 
परन्तु उस शुरु (रीति) पर विदव्रास फरनेसे उदाहरण सब 
अभी ठीक निकलने लग पड़ेंगे। पर खबरदार | गुरुजीके बनाये 
हुए गुरु ( रीति ) फो द्वी औरका और समझकर मत याद करे। 
प्रतिमा क्या है ? जिससे मान निकाछा जाय, मापा ज्ञाय, 

जब तोलनेऊझ्ा घट्टा छोटा हो तो. तोछका मान बड़ा होता दै। 
जैसे तोलनेका बडा एक प्राव होनेपर यदि किसी चीज्ञका मान 
चार हो, तो वह्मा एक छटांक होनेपर मान सोलह होगा। अब 
हिन्दूधमंके यहां प्रतीक और प्रतिमा क्‍या थे ? ईश्वरकों तोलनेका 
बट्मा । हिन्दूयर्म्ममें अति उच्च सूच्ये चन्द्रमारपी प्रतीक भी हैं । 
इससे उततरकर गुरु ब्राह्मण रूप हैं, गो गरुड़ रूप भी, अश्वत्य 
बुन्दाहूप भी; कैलास गया रूप भी और हठिंगनेसे गोडमोछ काले 

. पल्थरको भी प्रतिमा ( प्रतीक ) छूप स्थापित कर दिया है यह 


:  झमंकी उपंसना 
झोडेखे छोटा अदीकऊ क्‍या परमेइ्वरकछो -ुच्छ चवानेके छिय्रेथा ९ 
नहीं जी; प्रतीकका छोटा करना इसलि्यि था; कि ईस्वस्मज़ 
ओर त्रह्महष्टिक्रा समुद्र वह, निकछे, जब उस्र नन्‍्देले पत्यरको 
भी ब्रह्म देख तो अखिल पदार्थ ओर समस्त जगत तो अवश्यमेचर 
प्रह्मछप भान हुआ चादहियें। परल्छु जिसने समूर्तिपुजा इस 
समससे की, कि यह जरासा पत्थर .हो ज्ह्म है, वह हो गया 
अपत्थरका कीड़ा? । कर 
मे परापूजा 
फ . पद्ाथेके माकार, लाम रूप आदिले उठकर उसके आनल्दु 
आर सत्ता अंशमें चित्त ज्ममाना, पद या शब्दसे छठकर जसके 
अर्थमें जुड़नेकी घरद चरम्मंचक्लुले चश्यमान सूरतकों सूछ अहमसे 
भन्न होना रूपी जो डणाखना है; क्‍या यह किसी न किली दियत 
प्रतीकद्ठा। द्वी को जाती चाहिये! अतीक तो वच्चेकी पाटोकी 
तरह दे, उसपर जब छिखतेका हाथ पक गया तो चाहे जहां 
छिखि। त्रह्मदर्शंनक्षी रीति आ गबी, तो जहां हृप्ठि पड़ी, श्रह्मावल्द्‌ 
छ्््ने नो अतीक डपासना धव सफर होती है, जब हमें 
सर्वत्र श्रह्म देखनेके योग्य बना दे। सारा संसार सन्दिर बन 
जाये । हर पदार्थ रामकी कांकी छराये; मोर हर ख्िचा पूजा 
हो जाये । 
जेवा चल तेती परदुखना, जो कछु करूं सो पूजा । 
ग्रूहडद्याव एक सस जानू, भाव मिठायो दूज़ा 
न प और जीती उपासता जिनके झन्दर बोबनको प्राप्त 
है इनकी अवस्था श्रुद्ति ( तैिरीय शाला ) यों श्रतिपादन 
करती दै। 
या वेंड्चते स दीक्षा, यदब्नातितद्धुवि:, 
चास्पिबति तदस्थ लोमपानं, यद्रमते तहुपसदो, 





- एरापूजा थ 
यत्संचरत्युपविशत्युत्तिउतोिचग्बस्षों, 
यन्युख तदा हवनीयो, याव्याहृतिराहुतियंद्स' 


विज्ञान तज्जुद्दोति ॥ 
मुक्ति, शान्ति ओर सुख चाहो, तो मेद-भावका मिटाना और 
अक्षदृष्टिफा जम्ताना ही एकमात्र साधन है। यह दृष्टि क्यों आवश्यक 
है ९ क्योंकि बत्ठुतः यद्वी सब कुछ है-- 


“ब्रह्म सल्यम जगन्मिध्या |!” 


अगर गर्मी, भाप, विजली आदिके नियमोंके अनुसार रेल, तार, 
बैलून गादि यन्त्र बनाओगे तो चछ निकडेंगे, और कानूतको भ्रुढा- 
कर झआख यज्ञ करो, अंधेरी कोठरीसे कहां निकछ सकते हो ? अब 
देखो, यह जाध्यात्मिक कानून ( भमेद भाववा ) तो तत्वविज्ञान 
( साय॑स )के सव नियमोंका नियम है, जो बेढ़में दिया गया है। 
इस कार्यको परिणत न करते हुए क्योंकर सिद्धि द्वो सकती है। 
““अमरीकाके मद्त्मा अमरसेनने अपनी निमकी अ्रतिदिनकी अनुभूत 
' परीक्षाको, रूद्यानी वजरुबेकों पक्षपात रहित देखकर क्या सच कह 
दिया है कि किसी बस्तुकी दिछसे चाहते रहना, अथवा दांत निकाछ- 
कर अधीन मिखारीकी तरद्द दूसरेको प्रीतिका भूखा रहना, यह पवित्र 
प्रेम नहीं है। यह तो अधम नीच मोह है । केवछ जब तुम सुके 
छोड़ दो जोर खो दो ओर,उस उच्च-भावमें उड़ जाओ जहां न में" 
रहू' न तुम, तब तो सुके खिंचकर तुम्हारे पास आना पड़ता है ओर 
.छुम मुझे अपने 'चरणोंमें पाओगे। जब तुम भपनी आंखें किसीपर 
छगा दो और श्रीति्ी इच्छा करो, तो उसका उत्तर तिरस्कार 
अनादरके सिवा फभी और छुछ नहीं मिला,न मिलेगा । याद 


खखो। - 
- आई! इसमें पतथाई झागड़ोंकी क्या आवश्यकता है ? हाथ कंगन- 


श्० रामकी उपासना 


-....>+7__३तै++++त+__+555>5>०5०-++++:४/ 
को आरसी क्या है? अगर क्छेशरूपी मौत मंजूर नहीं, तो शान्ति- 
पूबुंक अपने चित्तकी अवस्था और उसके दुःख-सुख रूपी फरूपर 
पकाल्तमें विचार करना आरमस्म कर दो, सच भूठ आप निथर ही 
आय्रेगा । अगर घुममें बिचारशक्ति रोगप्रस्त नहीं है तो खुद्बखुद 
यह फ़ौसछा करोगे कि चित्तमें त्याग अवस्था और ब्रह्मानन्दके होते 
हो ऐश्वय्जे-सौमाग्य इस तरह हमारे पास दोड़ते जाते हैं, जैसे भूले 

घालक माँके पांस-- धो के, 


अथाहि छ्षुधिता बाला मातरं पर्युपासते । 


जब हमारे अन्दर सच्चा गुण और शाल्तिरूपी विष्णु होगा, तो 
लक्ष्मी अपने पतिकी सेवा करनेके लिए हल़ारोंमें हमारे दुर्वाजेपर 
- अपने आप पड़ी रहेगी। ही 
कितने दी मनुष्य शिकायत करते हूँ कि सक्ति ओर धम्में करते 
करते भी छु/ख और दारिद्धथ उन्‍हें. सताते हैं और अधस्मी छोग 
उन्नति करते जाते हैं। यह दुखिया भोले भाके कार्य्ण कारणके 
निर्णय करनेर्स अस्पय व्यतिरिकको नहीं वर्त रहे हैं। इनको यह 
मालूम ही नहीं कि धर्म्मू क्या है और भक्ति क्या। स्वार्थ ओर ईर्षा 
(देहामिमानोको तो उन्होंने छोड़ा ही नहीं,जिलका छोड़ना ही घर्म्मे- 
हे मप्र छात्रा था । अब घनका यह उलहना कि धस्मेको वर्त्तते-- 
रति ढुःखरमें डूबे हैं, क्योंकर ठीक कहा जा सकता है ? अगर 
धम्मेको ठीके कायदेसे घस्ता होता, तो यह शिकायत, जिसमें 
स्वार्थ ओर ईर्पा दोनों मौजूद हैं, कमी न करते । वह दान और भजन 
भी घर््ममें 8 हि हो सकते जिनसे अहंकार और मिमान 
बढ़ जायें। जहाँ पापी फलता फूलता पाते हो बहाँ सुखभोगका 
कारण ढढो तो उस पुरुषका चित्त आत्माकार ओर -एकान्त रहा था 
जो छुमने देखा नहीं;और उसके पापकर्मका परिणाम खोजो तो महह- 
फ्लेश ह्वागा, जो अभी तुमने देखा नहीं | 2 


परापूजा श्र 


सुमपर किसीने व्यर्थ अत्याचार कियाह तो अहंकाररहित 
होकर पक्तपात छोड़कर तुम अपना अगला पिछछा हिसाव 
विचारे। तुमको चावुक केवछ इसलिये लगा कि तुमने कहीं 
अयुक्त रजोंगुणमें दिल दे दिया था, आत्मसम्मुख नहीं रहे थे 
गमके काननको तोड़ बैठे थे। मनके श्रह्माकार न रनेसे यह सजा 
मिली । अब उस अनथ्थकारी वैसीसे जो बदला लेने और छडने तो 
हो, जुरा होशमें आओ कि अपनो पदली भूछको और भी घचौगुनो 
पांचगुनी करके बढ़ा रहे हो और प्रतिक्रियासे उस अपराधी रूप 
जगतके पदार्थक्रों सत्य वना रहे हो और त्ह्मको मिथ्या 

बच्चा। याद रखो एंठों तो सही, उदरके जाटेकी तरह 
मको न खाभो और वारवार पटके न जाओ तो कहना) प्राय 
लोग औरो'के कसूरपर जोर देते हैं और अपने तई' बेकसूर 
टहराते हैं! हां, प्रत्यगात्मारूप जो ठुम हो बिल्कुल निष्कंक 
ही हो ) पर अपने तई' शुद्ध आत्मदेव ठाने भी रहो, चुपड़ी और 
दो दो फ्यो'कर वने, अपने आपकी शरीर मन घुद्धिसे तदात्मता 
करनी और बतकर दिखाना निष्णप, यही तो घोर पाप है; वाकी 
सब पार्पोकी जड़। अब देखो जो शद्ररूप कानून तुमको सत्य 
खरूप आत्मासे विमुख होनेपर रुलाये बिता कभी नहीं छोड़ता । 
बह देवर उस अद्याचारी तुम्दारे वैरीकी वारी क्या मर गया 
है ? कोई उस त्रयम्बककी आंखोंमें नोन नहीं डाछ सकता । पस 
छुम कौन हो ईश्वरके काननको अपने हाथमें लेनेवाले ! छुमको 
पराई कया पड़ी अपनी निवेढ़ तू। बदला लेनेका ख़थालू 
विश्वासशुन्य नास्तिकपन है। 

ओ प्यारे, मेरे अपना आप, & पाठुर मूर्ख | जितना ओरोंको 
चने चवाना चाहता है उतना अपने तई त्रह्मध्यानकों खांड खीर 
खिला। चैरीका दैरीपन एकदम उड़ जाय तो सही। ब्क्ष है 
ओर ब्रद्यको भूछ जाना द्वी - ढुःखरूप मम्ेला है। जो तुम्हारे 
अन्दर है थद्दी सबके अल्दर है । 


हर रामकी उपांस ै 








यदेवेह तदघुत्र यदरृत्र तंदन्विह ॥॥- 
जब तुम अन्दस्वालेसे बिगड़ते हो तो. जगत्‌ तुमसे बिगढ़ता 
है, जब तुम अन्दरका अल्तर्यामीरूप बन बैठे तो जगत्रूपी 


घुतछोघरमें फल्ताद तो कैसा, किप्त काठके ढुकड़ेसे च मी हो 
सकती दै ९ * 


आओ मनसि तिप्ठन्मनसोन्तरो, थे मनो ने वेद, यरुय सनः 


आरीरं, यो मनोउन्तरो यम्यत्येष त आत्परान्तर्वाम्पसतः । 
जब तुम दिलके मकर छोड़कर सीधे दो जञाओ तो चुम्दारे 
* भूत भविष्य वत्त मान, तीनों छाल, उसी दम सीधें हो जायंगें 
प्यारे! जैसे कोई मोटा ताज़ा महुष्य बग्गीमें ज्ञा रहा हो 
सो तुम जानते हो कि उसझ्ली सोटाई फिटनसेंके तक्रियोंसे नहीं 
आयो, उसकी पुष्टाईका कारण दिन्हिनाती हुई ख्चरें नहीं हैं, 
बल्कि अन्यक्रों पचानेसे शरीर बढ़ा फ़ेला है। इसी तरई जहां' 
कहीं ए श्वय्य और सौभाग्य देखते हो, उसका कारण किसीकी 
चाछाको फन्‍्द फ़रेव कभी नहीं दो सकते ! कृस्में दिछाकर पूछ 
देखो । जिस हृदुदक चालाकी फन्‍्द फ़रेव बरतें गये, उस हहतक 
जरूर द्वानि ( नाकामयावी ) हुई होगी। आनन्द सुखका कारण 
और कुछ नहीं था, सिवाय ज्ञाततः अथवा अज्ञाततः चित्तसें 
शक्षमाव समानेके । यह अन्न खाते तुमने उसको नहीं देखा, तो 
फ्या? और वह खुद मी इस बातको भूछ गया हैतो क्‍या 
( बच्चे कई दफा रातको दूध पीते हैं, ओर दिवको भूछ जाते हैं, ) 
पर भाई सेलको तो विलोंद्ीसे माना है, सुछझा आनन्द इकबाल 
फभी नहीं झा सकता बगैर आत्माकार बृत्ति रहनेक्े। है 


यदा चर्मवदाकाओं वेषयिष्यन्ति मानवा।। , - 
तदा देवमविज्ञाय दुःखस्यान्तो भविष्यति ॥ ' 


परापूजा श्र 


जब लोग भमंकी तरह भ्ाकाशकों लपेट सकेंगे तब देवको 
जाने पिता दुःझका अन्त हो सकेगा। 

इण्टान्त, प्रमाण, दलील, भनुमावसे तो यद सिद्ध है ही, पर 
मं इस समय युक्ति आदिकों अपील नहीं फरता; में तो बहुत 
ने (समीए ) फा पता देता हू । यह तुम हो और यह हुम्दारी 
इनिया है। अब लो, खूब आंखे खोलो । जब तुख्दारे चित्तमे 
दुनियाफ सम्बन्धोकी तुलना ईश्वरफे भावसे अधिक हो जाती 
है, जब 'में” मेरा भाव चित्तमें ्ाग और शान्तिको दीचे दबाता 
है, गो जिस दर्जेतक “अ्रह्म सत्यं जगन्मिथ्या” रूपी सत्यकी 
आचरणते उपेक्षा झरे दो; उसी दुर्मेतक दुःख फ्केश तम्हें 
मिलता है भोर अन्चक्षपमें गिरते हो। बतत्पति और रसायन- 
दिद्याकी तरह निजफे तमरवा ओर मुशादिदा, परीक्षा और विचार- 
से यह सिद्धान्त सिद्ध है । 

झगतमें रोग एकद्दी है और इलाज ( ओपधि ) भी एकद्दी। 
चित्तले अथवा क्रियासे प्रक्षको मिथ्या और जगत्‌फा सत्य जानना 
एफ यद्दी विपरीत बृत्ति कभी किसी दुःखममें प्रकट होती है कमी 
फिसीमें । भर हर विपचिकी ओपधि शरीर आदिको “है नहीं”' 
समभक़र अ्षापिमें ज्वाठा रूप हो जाना है । 

छोग शायद ढरेते हैं कि दुन्ियाक्की चीजेसे प्रेम किया जाय. 
तो प्रेमफा जवाब भी पाते हैं, परन्तु. परमेश्बरसे प्रेम तो हवाको 
पकड़ने जैसा है; कुछ हाथ नहीं भाता। यह धोखेका खयाल 
है, परमेश्चरके इश्कमें अगर हमारी छाती जा धड़के, . तो उसकी 
एक दम वरावर धड़कती दे और हमें जवाब मिलता दे। बल्कि 
दुनियाके प्यारोंकी दरफसे मुहब्बबका जवाब जब ही मिलता दे 
जब हम, उनकी तारीफ्ल्ले निराश होकर, ईश्वर-भावद्वीकी ओर 
छूते हैं।.., 

. किसीने कट्दा, ड्ोग.तुम्हें ग्रह कहते हैं; कोई बोला, छोग तुम्हे 

चह कददते, हैं; कद्ी दाकिम ,विग्नड़े-गया, .कहीं मुकदमा भा पड़ा; 











श्छ रामकी उपासना 





कहीं रोग आ खड़ा हुआ । ओ भोले महँशा | तू इस -बातोंसे 
अपने तकलेसे ब्य ग॒ न पड़ने दे; भरंमें मत आ, तू एक न मात, 
श्रह्म विना दृश्य कभी हुआ ही नहीं, चित्तमें ग्राग और ब्रह्मानन्दू- 
को भर तो देख, सब चलाये. आंख खोलते खोलते सात समुद्रों 
पार न घह जाय, तो मुझको ससुद्रमें डुबो देना। 
एक बाछकको देखा जो दूसरे जालकुकों धमका रहा था, 
«ञाज पिताले तू फोखा पिंटेगा, ऐसा पिटेगा, कि सारी डमर 
पड़ा याद करें? दुसरे घालकने शाल्तिसे उत्तर दिया, “झगर बह मुझे 
मरेंगे तो भक्े द्वीको मारेंगे न, तेरे ह्यथ क्या व्लोगा १? इस बाढुकछे 
बराबर विश्वास तो हम छोर्गोर्में होना चाहिये, भयंकर भयानक 
भावीकी भनक पाकर बगुलेकी तरह गरदून उठाकर, घवराकर, “क्या? 
फ्या ९” क्यों करने छगे | आनन्दुसे बैठ, मेरे यार | बहां कोई और 
नहीं है; तेरा ही परमपिता, बल्कि आात्मदेव तो है, मगर मारेगा भी 
लो भलेके लिये | और जगर तुम उसकी मर्जीपर चलता शुरू कर दो 
सो बह पायल थोड़ा है, कि योद्दी पड़ा पीटे | 


एकायतासें विश्न 


( १ ) मिथ्या कारण सत्तामें विश्वार 


अपने ठई पूरा पूरा और सारेका खारा परमात्साके हचाले फर 
देनेका मजा त्वतक तो आ नहीं सकता, जबतक संसारके पदाथोमे 
कारणत्व सत्ता आन होती रहेगी, अथवा ज्वतक ईइघर हर चातका 
पफमान्न कारण प्रतीव व होने रूगेगा | 
अरबी, फारजी, इढू में कारणको 'सबच! कहते हैं, और जरबीें 
ह& “डार-रछा” | हम देशका स्वासी-ज्यार 
इन की भापामें 'नोछाना जल्ाछ' इस चामसे प्रल्तिद्ध 
सिड्वा |; “यह. कारण-कास्ये-भावरूपी रससाजो इस 
उ्मनदपत सब घस्टोंके गहेमें वंदा पाते दो, . यह क्‍यों फिरता/ 









एकाग्रतामें विश्न १९ 
है इस वेध्राण रम्जुको तो क्या फिसमा था; कूपमें सिरपर देव 
चर्त़ी घुमा रद्दा दे, पर इमें रस्खादी सत घटवन्त्रको चलाता 
न होता है, कारण कारणानां तो देव ही दे । 


स॒ यथा दुन्दुमेईन्यमानस न वाह्यान्छव्दांछक्लुयादूग्हणाय 


दुन्दुमेस्तुग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दों गृहीतः ॥ 
से यथा शद्खस ध्मायमानस न वाह्माज्डव्दाज्छकनुयाद | 
ग्रहणाय शहखस्य तु ग्हणेन शब्स्सध्मस्य शब्दोगहीतः ॥ 
से यथा वीणाये वाद्यमानाय वाह्माब्छवब्दाउछ क्नुयाद अरहणाय' 
वीणाबैठु ग्रहणेन बीणाबादस्य वा शब्दों गरहीतः ॥ 

जैसे दोल, मददड्ढ, शह, वीणा, हार्मोतियम आदिकी आवाजें 
रूब अपने आपही पडी जाती हैं, जब हम इन वाजों था थस्त्रों- 
को क़ाबूमें करते हैं। इसी प्रकार संसारकी कार्थ्य-फारण-शक्ति 
एक दस हमारे अथीन हो जायगी, जब हम एक परमात्मा देवको 
प्रफी तरद पकड़ छेवेंगे। ' 

फिसी चडू। भदमीकी सिफारिश विद्या, घछ, धन, माछ, 
मकान आदिकों मो अपनी श्राशापूर्तिमं कारण ओर हेतु तन 
बैठते हो और भात्मचष्टिका आश्रय नहीं लेते, धोखेमें गिरते हो, 
हुःख पाओयगे ४ 

कद्दते हैं. कृष्ण जय ग्रोषिकाओंका दूध माखन झादि खाता 
थए तो छुछ दधि आदि घरमें वस्धे हुए बहड़ोंकी थोधनीपर छगा 
देदा था। - घरवाले अपने -दी बछुड़ोंको चोर समझकर उन 
गरीबोंकों बहुत मारते-पीठले ओर झपनाद्दी मुकुसान, करते थे। 
प्यारे! कारण तो हर वातका एकसात्र -सगवानः .है,. बाकी 
कारण तो: फेवछ चिट्ठी थोथनीतडे वेचारे बछड़ो हैं। कट्ठके 
दीवालियोकि नाम - दजारीलाड, रखपतराय, करोड़ीमल मादि 
संखे हुए हैं । 


श्‌द- रामकी उपासना 


50:26 कमल 2क मिले कक मकर अमन 
, क्यों चक्तरमें मारे सारे. फिरतें हो ९ ऊपरके सांसारिक सिश्या: 
लिंय हेतु मादिपर मत भूछो, यह असली फारण -नहीं | 
जबतक छद्की व्यादी नहीं जाती गुडढ़ियोंसे जी चहछाती दै। 
कारणोंका कारणरूप परत्रह्म जब मिल सकता दै तो मिथ्या- 
कारणोंसे जी-वहछावा क्‍यों कसा ९ * 
मआनमतीका तमाशा: हुआ। पुठलियाँ सोचती हैं। “एकत्र: 
डूखरीको घुछाया, इसल्यि चद्ध आ. गयी। एकने 'दूलरीको पीट, 
इसलियि वह मर गयी?” इस प्रकारके कार्य्य-कारण-सावपर 
प्रायः सझुष्य भूछ रहे हैं, असली कारण तो एक . पुतकीगर 
( अन्वयामी ) सूत्घार है। न पड 
गीत था बॉसुरी झुंनने छगो, एक खरंके -बाद्‌ दूसरा स्वर 
आया; एक .शब्द दूसरे शब्दको झवश्य छाया;, इन शब्दों ओर 
खररोंका आपसे. आवश्यक लगाव है, इस प्रकारके काय्यें-कारण: 
भावपर छोग भूछ चैंठते .,, असली कारण तो भानेवाला. 
( वंशीघर ) है । | | 
एक ऊंचा मकान था, शिखरकी मंज्िबका आश्रय क्या हैं; 
उससे निचली मंजिल ओर उसका आश्रय उसके नीचेकी मंजिल: 
फर्शकी मंज्ि घाकी सबका आश्रय और कारण | इल प्रकारके- 
काय-कारण-संस्वन्घपर छोग भूल बैठते हैं। असछी सभीब कारण; 
तो इन सब मंजिलॉंका मकान बनानेवाह ( कतों, हर्ता ) है।- 
संसारके कारणोंको ' आशाकी आँखसे ताकना तो खारी- 
समुद्रमें इब्ततेको विनफ्रेका सद्धरा है। जन गोपालचर् (छऋष्ण ) 
को चहां सुदर्शन जुड्य नहीं, रथका चक्र ्दाफर ही अपनी 
पतिज्ञा तोड़ठो छी, (भीष्म ) बुड़ढेको भी चह- छड़कपन. 
देख बड़ी हँसी,आयी । अब फिर वही काम से होने जय । यह 
चर्मचल्लुरें मंजर कारण, आश्रय: सहारे 2० 
720 
बनेगा ? पे 90५ ; 4 
१ छुम अपने असली स्वरपक्नो हो चांद करो, आंकों, 


शकाम्रताम विन्न १७ 
खोलो क्रिस चक्रस्में .पढ़े हो, किप्त कगड़े में भड़े हो, किस 
कलकऋलमें फंसे हो ? तुम तो वही हो, वही। जरा देखो अपने 
असली सुदर्शनड्री तरफ, तुम्हारे भयसे सूर्य कांपता है, तुम्हारे 
डससे पवन चलती है, तुम्हारे खौफसे समुद्र एछछठा है, तुम्हारे 
चल्ुकसे मौत मारी मारी फिरती है। 

भीपास्माद्मातः पवते। भीषोदिति दूर्य्यः। 
भीपास्मादरि्चेन्द्रइच सृत्युधांवति पञ्चमः ॥ 

ये डरसे भेहर # आ चमका, अहाह्मह्य अहाहाहा । 

उधर मह्द "' चीमसे $ रूपका, अह्यहाह् अह्वहाह्य ॥ 

हवा अठखेलियां करती है मेरे इक इशारेसे । 

है कोड़ा मोतपर मेरा, अह्द्मह्य अहह्मद्य ॥ 

झरे प्यारे ! विपयोके वश रहना ठो पराधीनतामें मरना है, 
इप्त बेबसीका जीना तो शरीरको क्त्म बनाकर मुवेकी तरह सहुनां 
है। ५निर्ममो निरहंकारः” हुए आत्मज्योतिः शरीसमेंसे इस प्रकार 
फैल्ती है जैसे फानूसमेंसे प्रफाश!। जिस कार्य्यमें ऊपरके लक्षण 
देखकर अनुमानके झा्रय आशा्डी पाशमें दिल फंसा दिया जाय, 
बह फार्य्य कभी नहीं होगा। मिनको अलुमाव और लक्षण मान 
रपखा दै मलुप्यक्ो मिथ्या संसारमें इस प्रकार फंसाते हैं जैसे मछली- 
को मांसकी बोटी जाढमें ( $डीमें)। जब ऊपरी फारणोंको दिलों 
न जमाकर, स्वार्थांशकों ्यागकर; कोई भी कार्य्ये इस भावनासे 
किया जाय कि “हे राम! यह तुम्दास ही काम है। उुम्हारा है; 
इसलिये में अपना समझता हूं। जो हुम्द्दारी मर्जी सो मेरी मर्जी, 
का्येंके होने न दोनेमें मुझे हानि नहीं, राम नहीं, मेरा आनन्द तो 
केवल तुस्दारे साथ असेद रहनेमें है, कामको यदि संचार दो, तो बाद... 
# एर््य 4 चन्द्र कै खौफ 5 
२ 


श्छ्ः रामछ्ी उपासना 


वह [?, जब स्व दिलसे यह. भावना ओर यह दृष्टि हो; तो क्या 
दुनिया ओर दुनियाके कानूनोंको शास्त आयी दे कि चाकरोंकी 
तरह तत्काछ सब काम न करते ज्ञायें। मसला रामके कामसे भी 
अटकाव हो सकता है? भगवदुगीताके मध्यमें जो श्छोक कि: 
मा इधर और आधा उधर गुरुत्व क्रेन्द्रकी तरह तोल देता: - 
है यह तु 
अनन्याश्रिन्तयतोी .भां ये जनाः पर्कुपासते । 
तेषों नित्याभियुक्तानां योगक्षिम वहांस्यहंस्‌ ॥ , 
भगवानका यह तमस्सुक ( इकरारनामां ) तबं भी मूठ नहीं 
होगा.जब अप्रिकी ज्वाला नीचेको बहने. छगे, ओर: सूस्ये पश्चिममें 
रुदय द्योना आर्‌स्स कर दे.ओर पूर्चमें झस्त। ; 
यार! मलुष्य-जल्म पाकर भी हैरान और शोकालुर रहना. 
बड़ी शर्म ( ल्ज्ण ) की बात है । शोक-चिल्तामें बह डूजें, जिनके. 
मां घाप मर जाते हैं, तुम्दारा राम तो सदा जीता है, क्‍या गम ९ 
जरा तमाशा तो देखों, छोड़ दो शरीरकी चिन्ताको, मत रखो, 
किसीकी आस, परे फरेको वासना, कामना, एक आत्मदृष्टिको 
दृढ़ रखो, तुम्हारी खातिर सबके सब देवता छोहेके चने भी 'चाब. 
का! 
.._ रुचे च्राह्म जनयन्तो देवा अग्ने तदबुबन। 
अस्त्वेद॑ न्राक्मणो विद्यात्तस्य देवा असन्वश ॥ 

( शु० यज्ञु० अ० ६१ ) 
सर्वाण्येन भूतान्यमिक्षरन्ति ॥ बहण।.. 
सर्वें>स्म देवा चलिमावहन्ति ॥ तैच०॥ 

न पव्योसृस्पुं पद्यति, न रोग, नाति दुःखतां, 
सब ९४ हू पश्य) पर्यति, सर्चमाप्तोति सर्वशः ॥ 
: छान्दोग्य० ॥ 


द्वेषदृष्ट श्र 
कोई सन्दिध शब्दोंमें तो चेदने कहा ही नहीं। जब 


सर्वात्म-दरष्टि हुई तब रोग,हुःख और मोत पास नहीं फटक सकते, 
जात्माक़ो जाने क्‍या नहीं जाना जाता, ओर हर प्रकारसे हर पदार्थ. 


मिल जाता है। 

हा (२ ) हेपदष् 

आलनलन्‍्द-धामकों चित्त चला तो वैरी-विरोधीका स्याल डाकूहपः 
होकर चित्तकों ले उड़ा । 

युरोपमें एक दिन एक तत्वविज्ञानका लायक डाक्टर (आचार्य्य) 
अपने पास आनेवालोंडी कुछ निन्‍्दासी करने लगा, उससे पूछा, 
“आप शिकायत काते हो ९” तो बोला, “नहीं; मैं उनके दिचकी 
सआध्यात्मिक देशापर विचार करता हूं [” 

ढुनियामें हमलोग बराबर यही तो करते हैं | हे पहष्टि ( और 
दुप्ट भाव ) को फोई श्रेप्ठता नाम देकर आंखोंपर परदा डाल 
लिया और इस सर्पिणीक्ो वराबर छातीसे छुग़ाया किये | 

किए जब फद्ा गया, “प्यारे झफर | सम्बन्धवाल्नोंकी झाध्या- 
त्मिक दशा अकेली विच्यरके, योग्य नहीं होती ! अपनी झाम्य- 
न्तरिक्र दशा भी उसके साथ-साथ विचारणीय है । साथी जो 
बिगड़े चित्तवाढ़े मिले हैं, वो क्या आजकछ आपडी झ्ाभ्यन्तरिक 
अवस्था पिलकुछ दूषण-रद्दित थी (” डाकर आदमी था सच्चा, 
कुछ देर चुप रदकर विचारकर बाछा, “स्वामिन्‌ ! कहते तो बिल्ल- 
कुछ सच द्वो ” वास्ववर्में जेसा मे चित होता है वैसे चित्त और 
स्वभाव मेरे पास आषित हो जाते हैं, आरोंकी अवस्थापर भला, 
बुर चिन्तवन फरते रहनेस कमी झगड़ा निपटता भरी नहीं, उन 
लोगोंको क्या पकड़, सव मनोंका मत में हूं, सब चित्तदा 
चित्त मैं हूं। अद्र्स ऐसी एकता दै कि अपने तई शुद्ध करते ही 
सब शुद्ध दी छुद्ध पाता हं। सम्तीपका इलाम ( अपने तई' ब्रह्म- 
मय कर देना ) ते! दम करते नहीं, दूरके बल्दोबस्त ( ओरोंके सुधार): 


जज रामकी उपासना 





को दौढ़ते हैं। न यह द्वोताहै न बह। इेश्वर-दशेन तो तब 
मिलेगा जब सांसारिक इृष्टिस प्रतीयमान वैरी-विरोधी: निन्‍्दर्क 
लोगोंको क्षमा करते हम इतनी देर भी न लगाएं; जितना आग गाजी 
अनकोको बहा छे जानेमें छगाती हैं. या जितनी आंछोक फिप्पों 
अन्धकारके षड़ानेमें लगाती हैं। 


ज्ञबतक सर्व पदार्थोमें समधी नहीं होती तचतक समाधि कैसी ९ 
विषम दृष्टि रहते, योगकी समाधि ओर ध्यान वो कहां, धारणा भी 
होनी असम्भव है । समदृष्टि तव होगी जब लोगोंमें सलाई- 
चुराशकी भावना उठ जाय। ओर यह क़्योंकर छठे ? जब छोगोंमें 
औदु-भावना घठ जाथ और पुरुंषोंको अहासे भिन्‍न मानकर जो अच्छा- 
यरा करपना कर रक्स्ता है न करें। समुद्र जेसो तरंगे' होती हैं, 
कोई छोटी कोई बड़ी, कोई ऊ'ची कोई नीचो, कोई लिछी कोई सूधी, 
उनकी सत्ता समुद्रमें अलग नहीं मात्री जाती, उनका जीवन सिन्न 
नहीं जाना जाता । इसी तरह अच्छे-बुरे आदमी ओर अमीर-गरीब 
क्लोग तरंगे' हैं; जिनमें एकट्दी मरक्ष-समुद्र डाढ़ें मार रहा है, अह्याह्मह्म | 
अअच्छे-बुरे पुरुषोर्मि जब हमारी जीवहृष्ठि उठ जाय और उनको 
अद्वरूपी समुद्रकी छद्वर॑ ज्ञान लें; तो राग-द्वे पड़ी अग्नि बझ जायेगी 

और छातीमें “ंढक पड़ जायेगी। जो छद्टर ऊँची अढ़ गयी है 
चह अवश्य नीचे गिरेगी; इसी तरह जिस पुरुषमें खोटापन समा 
गया है, उसे अवश्य दुःख पाना ही है। परंतु छहरोंके ऊँच और 
चीच भावक प्राप्त दोते रइनेपर भी समुद्री प्रष्ठको क्षितिज धरातल 
ही भाना है। इसी तरह वीचिरूप स्ोगोंके कर्म ओर कर्मफलकों 
आप्त रहनेपर भी ब्रद्माूपी समुद्की समतामें फू नहीं पड़ता। 
खेत तमाशा भी जया झुलदावी जोर आलन्दवलंक दोहा 
डे, पर जहां जो पुरुष उनसे सींग जाये या इबने छगे, उसके 


हल उपद्रव रूप है। समुद्रदृष्ट होनेसे समधी और समाधि 


स्वार्थ-फपट रह 


, (३ ) खाथ-कपट 
उपासनाकी जान समर्पण और आत्मदान है, यदि यह नहीं वो 
उपासना निष्फछ ओर प्राणरद्वित हैं। भाई! सच पूछो तो हर 
कोई छेनेका यार है। जवतक तुम अपने दुःख ओर अहंकारको 
परमेश्वरके हवाले न करोगे, तो ठुम्दारे पास बैठना तो फैसा, तुमसे 
कोर्सो भागता फिरेगा, जेसे कुष्ण भगवान कालयसनसे ! उस 
आंखोंदाले प्रव्ज्वल्तिहदय सूरदासने विलविछाते बच की दरह क्या 
ज्ञोस्से सच कद्दा है :-- 
किन तेरी गोविन्द नाम घरों । 
लेन-देनके तुम हितकारी मोतरे कछ न सरयो ॥ 
विप्र सुदामा कियो अजाची तन्दुरू भेंट धरमो। 
द्ुपदुसुताकी ठुम पति राखी अम्बर दान फरयो ॥ 
गजके फन्‍्द छुड़ाये आकर पृष्प जो हाथ परयो। 
सरकी बिरियां निढुर ह बैठे कानन रूंद परयो ॥ 
थदि चाहो कि परीक्षा तो करें क्रि भजन ( उपासना ) से फछ 
मिलता है कि नहीं, तो प्यारे | याद रहे “रीक्षाका भजन असंगत 
है. ओर अस्म्मतर है, क्योंकि निष्कपट भजन तो दोगा वह, जिसमें 
कछ और फल्की इच्छावाल्े अपने आपको इस तरह परमेश्बरके 
मेंड कर दें; जैसे अप्निमें आाहुति।.. है 
यह बिनती रघुवीर गुसाई ॥ , 
और आस-विश्वात भरोसो हरो जीव जड़वाई ॥ 
चहों न सुगति छुमति संम्पति कह रिविसिधि विधुर बढ़ाई। 
हेतुरहित, अनुराग राप्रपद बढ़े अनुद्व अधिकाई ॥ 
:.. यदि कोई कहें, जाहुतिद्दो जानेमें क्या स्वाद रहा! तो 





श्शे रामछी एर्पासंना 











रेखा पूछनेवालेको स्वांद (आनन्द) के स्वरूप दी बिद्ति 
नहीं, खुद ( अहंभाव ) के लोन हो जानेका ही नाम है. स्वाद, 
आनन्द । | न्‍ 

बच्चेने जब अपना नल्‍्हासा तन ओर भोछाभाछा मन, 
माताकी भोदमें डाछ दिया, तो सारे जद्दानमें उसके लिए कौनसा 
आराम शेष रहा, और कौनसी चिन्ता बाकी रही। आंधी हो, 
श्र॒पो हो, भूकम्प हो, छुछ दो, उसका वाल बांका घहीं ोगा, 


कैसा निर्मय है; क्‍या मीठी नींद सोता है और सल्लोनी जाप्मत 
छठता है । 


(४ ) प्रकृति-नियमंभक्ञ - 

जवतक तुम्हारी शरीरकी क्रिया डपासनारूप न हो; तुम्दारा 
'ऊपरसे उपासना करना व्यर्थ दिखछाना है, निष्फछ मन पस्चावा 
है। फ्रियारूप उपासनाका यहे अर्थ है कि खाने, पीने, सोने, व्यायाम 
आदिमें जो प्रकृतिके नियम हैं; उनको रच्वक मात्र भी न तोड़ा 
जाय। विपय-विकार स्वादोंमें प्रड़ना आचरणसे ईश्वर्की आज्ञा 
भर्ढ करना है, जिसका दण्ड रोग, व्याधि आदि अवश्य मिलना 
डहै। ओर जच पीड़ारूपी कारागार्में चेंत पड़ रहे हों, उपासना कहां 
दो सकती दे ) जिस पुरुषका स्वभाव दैसी ही क्रिया आदिरी तरफ 
हे जाय जैसा ईश्वरीय नियम चाहते हैं, जिस पुरुषकी इच्छा वही 
उठे जो मानों इैश्वरकी इच्छा दे, जिसकी आदत प्रकृतिको आदत 
दो, वह आचरणसे शिवोहम गा रद्ा दै। उसे दुःख कहांसे छग 
सकता है। 


नायमात्मा घलहीनेन लम्यः 
सुण्ढके उपनिषदूमें यहां बलसे तात्पय शरीरकी आरेग्यता दै 


और अध्यात्म चंछ भी दे, जिसको अध्यवसाय 
अ्ाप्रतिष्ठा" भी चलाए है। कहते हैं । गीताकी 


डउदारदा रे३्‌ 





निद्रा क्यों आवंध्यक है :--अ्रति दिन कामकाज करते 
करते मनुष्य प्रायः संखार ओर शरीर आदिश्नो सत्य मानने लग पंडृते 
हैं। परन्तु फामकाजके लिये शक्ति वछ तो आनन्द स्वरूप आंत्म- 
देवसे ही आना है मिसकी सत्ताके झागे संसारको नाम रूप सत्ता 
वा भेद भावना रह नहीं सकती! जगतके भन्धोंमें फँसे, हुएको 
नित्यप्रति निद्रा घेरकर प्रथ्वीपर फेंक्कर यह संथा पढ़ाती है कि 
यह जगत्‌ है नहीं, आत्मा हो अह्मा दै, क्योंकि निद्वामें संसार 
3228 जाता है और अज्ञानवः एक भाव्मा ही आत्मा शेष रह 
जाता है! 


पोछ निकाली जगतकी, सुषुप्त्यावस्था मांहि । 

नाम रूप संसारकी, जद्ां गन्ध भी नाहिं ॥ 

स यथा शक्षनिः सत्रेण अबद्धों दिशे दिश पतित्वान्य- 
बायतनंमलव्ध्या बन्धनमेबोपभ्रयत एवमेव खछ सोग्य तन्‍्मनों 
दिए दिश पतित्वान्यत्रायवनमतब्ध्वा प्राणमेदरोपश्रयते ॥ 

सुधुप्तितरा अक्ञाततः परमतत्वमें छीन हुए इस क़दर शक्ति 
बल्न जा जाता है तो उपासना ध्यान जादि द्वारा ज्ञात: परम तत्वमें 
छीन हुए शक्ति बल, आनत्द क्यों न बढ़ेंगे ९ 

जब देखो कि वित्व॥ क्रोघ, काम, ( तमोगुण ) घेरने छो हैं, 
प्ो चुपके उठकर जलके पास चे जाओ। आचमन करो, हाथ, मुंह 
ओओ, था श्लान ही कर लो [ अवश्य शांतिं आ ज्ञायगी और हरि 
ध्यान हपी क्लीरसागरमें डुबकी कृंगाओ ऋंधके छुए' ओर भाषको 
ज्ञान अंग्रिमें बदुछ दो । 

उपनाम आंकश्यकसुणण 
उंपास्वाकी चेटक यह कम और दोलतें, छोनो आम होती 


श्छ रामकी उपासना 





है। अब छुछ चीज़ यज्ञमें या और समयपर दी गयी तो चित्तमें 
5णढकक और शांति व्यापी, यह रख फिर लेनेको जो करने छगा। 
बाहरके स्थूछ पदार्थ कमी कभी देते दिलाते अति कठिन और 
सृक्षदान अर्थात्‌ चित्त वृत्तिका हरि चरणोंमें खोया जाना भी शततेः 
शरनेः आ जाता है । उपासना ध्यानका र॑ग जमने छगता है। अब 
यहांपर इतना विश्मयजनक है कि जिसे एक दृष्टिसे हमने खो देना 
( दान ) कहा है. चढद्‌ दूसरी ओरसे देखें तो छूट लेना है। भक्ति 
( उपासना ) चित्तकी उंस दर्जंकी उदास्ताका नाम है जिसमें अपने 
आप तकको उछालकर हरि नामपर वारकर फैश्न दिया जाय। उपासना- 
आनल्दको तंग विलवाला कभी नहीं पा सकता; जिसका दिल बाद- 
शाद्‌ नहीं; चह क्‍या जाने भक्तिससको १ ओर बादशाह वह है 
अपने दिलके मीतस्से एक छंग्रोटी ( कौपीन ) के साथ भी 
। 

घन चुराया गया; रोता क्यों है ? क्‍या चोर ले गये १ रो इस 
सममपर। प्यारे! और कोई नह्दीं है लेने छेजाने वाला; एक ही 
एफ, शुक्रकी आंख, यार, प्यारा अनेक चहानोंसे तेरा दिल लिया 
चाहता दै। गोपियोंके इससे बढ़कर और क्या सुकर्म होंगे कि 


कृष्ण मफ्खत चुराये। धन्य हैं वह जिनका सब छुछ चुराया ज्ञाय; 


मन और चिच तक भी बाकी न रहे | 
ककुमाय स्वेनानां पतये नमः 
नम निचेरचे परिचराय 
त्तस्कराणां पतये नमः ॥ 
ऋग्वेद ओर यजुर्वेदफे पुरुष तक्तमें दिखाया 
देवता छोगोंने विराद पुरुषकी दृवि दे दी तो उनके सब काम 
स्वयं ही सिद्ध होने छय पड़ें। चशाले जगठकी उत्पत्ति हुई । 
बद्दास्णयकोपतिपदके आदियें समस्त संसाररूपी अद्वका मेष 
फिस मनोहर रीतिसे वर्णन किया है । वाह वाह !- जब 


झु० यजु० सं० ॥ 
है कि जब ऋषि; 


* छदासा ६ श्श्‌ 








तक नाम रूप समस्त संसार और घिराट रूप समग्र जगत 
सम्यक्‌ प्रकारसे दान व कर दिया जाय, और यक्ञ वलिमें आाहुति 
न कर दिया जाय, तब तक अउृत चखनेका मुह कहां ९ 

०्सर्च खल्विदं श्रक्ष" रूपी ज्ञानकी अमिमे जगतके पदार्थ ओर 
उनकी कामनाका बिपटुकार हो जाय तो साम्राज्य ( वा स्व॒राज्य ) 
की प्राप्तिमें देर ही क्‍या दे ९ 

राजा बलिने जलका करवा द्वाथमें लेकर तीनों लोक भगवान" 
को दान कर दिये; तुमसे एक असुरके बरावर भी नहीं सरती । 
अपने शिर रूपी चमस वा खप्परको हथेछीपर ले सारे 'संसारमें 
सत्ता इृष्टि कर वो त्रद्यफे हवाले। बछा टी, बोझ हदा और 
फिर कप इश्वरत्व देने वाछे तुम हो, सूर्य चन्द्रमा भी 


ुम्दारे 
लोग कहते हैं, जी | भजनमें मन नहीं ठहरवा, एक्राप्नता नहीं 
होती। एकाग्रता भला कैसे हो, कृपणताके कारण बअन्दरकी 
रद मुद्दीसे पदार्था को तो छोड़ते नहीं भौर मुट्ठीमें लिया चाहते 
हैं रामको । भाखिर ऐसा अनजान ( भोछा ) तो बह भी महीं 
कि अपने आपह्ी हस्वे चढ़ जाय। 
जहां राम तहां काम नहिं, जहां राम नहिं काम ॥ 
राम तो छसकों म्रिलता है जो हतुमानकी तरह हीरों और 
जवाहिरोंको फोड़कर फेंक दे, “यदि उनमें राम नहों हैं तो इस 
इनामको कह घरूं, क्या करू” ॥ 
कुन्दकुब्जमस॒म्पत्य सरसिरुह लोचने। 
अप्नुता छुन्द छुड्जेन सखि में कि अयोजनस्‌ १ 
कर! रहित 'कुल्द' कुब्जको में क्या देखू' ? अर्थात्‌ मुकुद नहों 
तो छुन्द्‌ छुब्नको आग छगाऊं ९ भजन करते समय निर्लल् 
चित्तमें मकानके, खान पानके अपने मान, अपनी जानके ध्यान 





रद शमकी उपासना 


आ जाते हैं। . सूर्खाको इतनी समम नहीं कि यह चीजें चिन्तन 
योग्य नहीं; चिल्दन योग्य तो एक राम है। 
आत्म सैस्‍्थे मनः छूत्ा व किख्विंदपि चिन्तयेत्‌ ॥ 
प्रशुुका डेरा इमारे चित्तमें लगे, तो फिर कौन सी जाशा 
जो मपने आप पूरी न पड़ी होगी? 
जब तक पदार्थमें सत्ता दृष्टि है, या उसमें चित लगाये हुए 
हो, सिर पटक मारो; वह पदार्थ कभी नहीं मिलेया, या सुख- 
दायी होगा। जब यक्नवः अथवा स्वाभाविक उस पदार्थसे 
दिल चठता है, अर्थात्‌ आत्मारूपी अ्निकुण्डमें बह चीज़ पड़ती 
है, मनमें यज्ञ दो जाता है तो स्वयं इछ पदार्थ हाजिर हो 
जाता है। द्विमाठय पंचनको ठोकस्से गेंदकी तर शायद्‌ कमी 
डछलने भी लग पड़े, परन्‍्ठु चह कानून चालके घरावर कभी इत्तर 
नहीं हो सकता हि 
ब्रह्म ते परादाद्योउन्यत्रात्मनों त्रह्म वेद, 
श्षुत्र॑त॑ परादायोन्यन्रात्मनो छ्षत्र पेद 
लोकार्स्त॑ परादुरयों उन्यत्रात्मनो.. लोकान्वेद, 
देचास्त॑ परादुयोडन्यत्रात्मनों. देवांन्वेद 
भूवानि व पराहुयोंअन्यत्रात्मनों भूतानि वेद 
सर्व ते परादादोउन्यत्राप्पनों सर्रे बेढ 
दे अ्षेद क्षत्रमिमे छोका इसे देवा इमानि भृतानि 
द९७ सब सदयमात्मा ॥ घृहदारएयको पनिपद्‌ | 
बाठ घातमें गम दिखाता है, कि में द्वी हैं, जगत्‌ है नहीं 
अगर जगवड़ी 'चीजें दें, तो केवल मेरा फटा है लत दैदी:। 
भाई ! समाधि ओर मनझी ऐफरागता तो जंब दोगी, जेजे 
जुम्दारों नरफ़ते मांछे, घन, बंगंले, मकानंएर मानों हले फिर जाये। 


उदारता २७ 


स्त्री, पुत्र, वैरी, मित्रपर छुद्दागा चछ जाये, सब साफ हो जाये, 
रामही रामका तूफान ( ञव्यि ) आ जाये, फोठे दालान बहा 
हे जाये। 
अत्र पिताअपिता भवति, माताइमाता, छोका अलोकाः, 
देवा अददेवा), वेदा अवेदाः, अंत्रस्तेनो5सतेनों भवति, भूण- 
हाड्श्रणहा चाण्डाल्लोअ्चाण्डालः पोरकत्तो5पौरकस्तः श्रमणो- 
उश्रमणस्तापसोड्तापसः । दृहदारस्यकोपनिपदू ॥ 
जानेकी कोई ठोर ही न रही तो फिर भट्पे मत्को कहां 
जाना है ? सहज समाधि है। 
जैसे काम जद्दाजको सुज्ृत और न ठोर | 
मोहिं तो सावनके अन्धहं ज्यों तृश्ञत रह्व हरो । 
क्या मांगना भी उपासनाका अह्ठ है 
भांगना दो प्रकारका है, एक तो तुच्छ “मे” ( अहंता, 
ममता ) फो मुख्य रखकर अपनी वृद्धि और भोग फामनाके लिये 
प्राथना करनी ओर दूसरा ज्षानप्राप्ति, उलदशेन, हर्सिवा- 
को परम प्रयोजन ठानकर आत्मोन्‍नति मांगना। प्रथम प्रकारकी 
प्रार्थना तो मानों इश्वरकों तुच्छ नाम रूप ( जीव ) का अनुचर 
चलाना है । अपनी सेवाकी खातिर ईश्वरकों बुलाना है, 
उल्टी गंगा बहाना है। द्वित्तीय प्रकारकी प्रार्थना सीधी बाट- 
पर जाना है 
आत्मामें. चित्तके लीन होते समय जो भी सह्ृत्प द्वोगा, 
सत्य वो अवश्य हो ही जायगा, परन्तु यदि बह सहुल्प अज्ञानः 
अधर्स्मे और स्तार्थभय है तो कांटेदार विषभरे अछुरफी नहीं 
ढगकर दारुणं परिणामझ हेतु होगा। अहंता-ममता और भोग- 
कामना-सम्बन्धी इहवरसे प्रार्थना मेंठे तबि ( ताम्र ) के बर्तन 


र्८ रामकी उपासना 


पवित्न दूधकी भरना है। दुःख पाकर जो सीखोगे तो पहिंले 
ही अपवित्र बासनाको क्यों नहीं त्याय देंते। अशुभ सावसामें 
ओऔरोंका भी चुरा होता हे ओर अपनी भी खराबी । झुभ भावना, 
प्रित्र भाव विज्ञानकी प्राप्तिमं न केवल अपना ही कल्याण होता 
है बरंच परोपकार भी । मनमें सत्वगुण, शान्ति, आनन्द और 
शुद्धि हो तो हमारे काम स्वयं ईश्वरके काम होते हैं ! पूरे होते 
देर लग ही नहीं सकती । 
भागवत पुगणमें एक जगह यह श्छोक दिया है । 
देबासुर मजुष्बेषु ये भजन्ल शिव शिव! 
आ्रायस्त धनिनों भोजा न तु रक्षम्याः पतिं हरिस्‌ ॥ 
अर्थात्‌ आप जो भी कोई त्यागी शिवकी उपासना करते हैं 
वे धनवान हों जाते हूं। इस इछोकमें शिव और विष्णुकी 
छोटाई चढ़ाई दिखानेका चात्पय्य नहीं है | शिव और विष्णु तो 
बस्तुतः एकही चोज हैं। किन्तु, अमिप्राय यह है कि जिन 
लोगोंके हृदयमें शिवरूप त्याग ओर बेरात्र बसा है, ऐश्वय्ये, 
धन, सोभाग्य उनके पास स्वयं आते हैं और जिन लोगोंके झन्व:- 
करण ल्क्ष्मो, धनदीरवकी छाममें हैं थे दरिद्वताके पात्र रहते 
हूँ ऊँसे जो कोई सूर्य्यकी तरफ पीठ मोडकर पकड़ने दौड़ता 
दे छाबा उससे जागे बढ़ती जाती है. कमी कावमें नहीं 
आती, ओर जो कोई छावाते मु फेरकर हुर्व्यक्की ओर दोड़े 
तो छाय्रा अपने आपही पीछे भागती आती हे, साथ छोड़ती 
ही नहीं । 
कौन प्रार्थता अवश्य सुनी जाती ६ै--जिसमें इमारा 
स्वायो शा इतना कम दो, कि मानों वह सत्य स्वभाव इंइ्वरका 


अपना ही काम दे और यदि उपासनाफे समय मारे आनन्‍्दके 
वित्तकी यह दुच्चा हो रही हो-- 





उदारता रह 





यतो चाचो निषर्तन्ते अग्राप्प मनसा तह ॥ 
तो यही अवस्था ब्रह्मावस्था है और इस कारण सत्य कामना 
और सत्य संकव्पता तो स्वमावतः आजाती है। ' 
यह तो रही अति एत्कृष्ट उपासना। उपासनाक्ी जुरा 
ल्यूत स्थिति बंध कोसी श्रद्धा और विश्वास है, और यह निष्ठा 
भी क्या प्यारी प्यारी और प्रवक है बच्चा अपने भातापिताओो 
अनन्त शक्तिमान सानता है और उनके बलकों अपना बल्ल 
सममाकर माताकी गोंद्में बैठा हुआ शाहनशाही करता है, 
रेलको मी धमका छेता है। पत्रन और पक्षियोंपर भी हुकुम 
चलाता दे, दरियाकों भी कोसने लगता है ओर कोई घीज 
असम्भव जानता ही नहीं। चन्ट-सूर्यको भी हाथमें लिया 
चाहता हैं;-- 
चांद खिलोना के देरी मैया, चांद खिलोना हे दे । 
थन्य हैं ये पुदष उ भाग्यवाडे, जिनका इस ज़ोरका 
विश्वास सचमुच सर्वेशक्तिमान पितामें जम जाय, जोछुछ भी 
दरकार हुआ; भट देवका पत्छा पकड़ा और करवा लिया, दूध 
माँगना हो तो देवसे, भोजन बल्न मांयवा हो तो देवसे। क्या 
अच्छा कहा है -- ४ 
जग जाचये कोउ न जाचये जे जिया जाचये जानकी जानहिंरे ॥ 
जेहि जाचत जाचकता जर जाहि जहिं जारे जोर बहानहिरे । 
दुःखी दुष्टमें और रंगीढे मतवाले मत्तमें फरक सिफ़ इतना 
है कि एकके चित्तमें कामचा अंश ऊपर कै; भक्तिअश नीचे। 
दुसरेके, चित्तमें राम ऊपर है और काम नीचे । एक यदि साक्षर 
है हो उल्टपल्टसे दूसरा राक्षस दै । हि 
जब प्रेम ओर त्यागकां अश उपासनामें आाचना अशसे 


झ्र० रामकी ज्पासता 


अधिक दो तो वद्द मॉगना मो एक तरह देनेहीके तुल्य है। एर 
भाई) सच बात तो है यू, कि मांगना सच्ची उपासनाका कोई 
अंग नहीं; हां देना ( उदारता ) तो उपासना रूप है । जब अपने 
मतलबके लिये में तुम्हारी सेवा करूँ, तो इसमें तुम्दारी स्रक्ति 
कादैकी, चह तो दुकानंदारी है या उगबाजी। मंगते मिखारी- 
को कोई पास नहीं छूने देता, परमेध्वर तो बादशाह दे; मिख- 
मंग्रे कंगाल बनकर उसके पास जाओगे तो दूरहीसे छुर-दुर पड़ी 
होगी। वादशाहसे मिछंते चले हो, परे फको मैंले कुचले, 
पुराने इच्छारूपी चोथर्ड ! खानो के खानके मेहमान, जुबतक 
छुम बादशाह न बनोगे, बादशाहके पास नहीं बैठ सकते। इच्छा 
कासनाकी गन्धतक छड़ा दो, जमकर बैठो त्याग तख्तपर और 
बह तुम्दारे पाससे कभी हिल जाय तो मुस्ध्तें बांध लेना | 


टने कामन करके नी में प्यारा यार मनावांगी । 

इस टूने नं पढ़ फुकांगी सूज अभ्न जलाबांगी ॥ 

सात समुन्द्र दिल दे अन्दर दिलसे लहर उठावांगी । 
बदली होकर चमक डरावां वन बादल घर घर जावांगी ! 
टसे कामन करके नी में प्यारा यार मनावांगी । 

इक अगीठी अस्पद तारे सूज अग्न चढावां गी ॥ 
ला्षबां शोद न गल अपने तद मैं मार कहावांगी | 
टूने कामन करके नी में प्यारा यार सनावांगी ॥ 

ना मैं व्याही ना में क्वारी बेठा गोद खिलावांगी। 
इल्द्ा लामकाफ दी पोंडी उत्ते बह के नाद बजावांगी । 
हने कामन करके नी मैं प्यारा यार सनावांगी ॥| 


( पंजाबी काफी, थुछल्हा शाह ) 


रामको उपासना डर 


उपासना ओर ज्ञान । _ 
.. उपासना ऐसे है. जैसे गुगनके उदाहरण सिद्ध करना और 
ज्ञान यह है कि बीज्ञ गणिततक पहुंचकर उस गुणनकी बिधिका 
कारण आदि भी जान जाना। उपासना खान है ज्ञान सिद्ध 
अवस्था। उपाखनामें यज्नके साथ अन्दर बाहर ब्रह्म देखा जाता है । 
ज्ञान वह है. जहां यत्नरहित खाभाविक अन्दर तो रोम शेमसे - 
#उहूँ ग्रह्मास्मि”्के ढोल और सब हृत्तियोंको दबा दे, और बाहर हर 
जिसरेणु “तत्तमसि”का दर्पण दिलाता हुआ मेद-भावनाकों भगा. 
दे । यह ज्ञान ही असली त्याग है-- 
त्याग: प्रपश्व रूपय चिदात्मलावढोकनादू । 
त्यागो हि महतां पूज्यः सद्यो मोश्षमयों यतः । 
जहां शुठिने त्यागका उपदेश वर्णन किया है 'तित हक्तेनः 
मुजीथा:” वहाँ यागक्ा लक्षण इतना ही किया है। 
ईश्ञावाययमिद? सबे यत्कि जगत्यां जगतू॥ 
- जो छुछ दीखे जगतमें सब ईवररमें ढोंप । 
करे चेन इस त्यामसे धन छारूचसे कांप ॥ 
, ऊपर ऊपरके ल्याग इस असली त्यागके साधन हैं। यह त्याग- 
रूपी त्रह्मदष्टि यज्ञतः करना उपासना है। 
अब यह त्यागरूपी उपासना भो और त्यागों या दीसेंकी 
तरह होगी; करें वा न करें, किसीको पैसा दें था न बें--हमारी इच्छा 
पर है” जो ऐसा सममते हैं. थोखेमें हैं। यह त्यागरूपी उपासना 
आवश्यक है, आवश्यक क्‍यों! कि ओर कहीं ढंढ पड़नेकी. 
* नहीं । 
बृत्ति तबतक पकान्व नहीं हो सकती, जबतक मनमें कभी यह 
आशा रहे और कभी वह इच्छा । * शान्‍्त वह हो सकता है जिसे 
- कोई कतेव्य और आवश्यकता खींच घसीढ नरदी हो। अपने: 


९ रामकी उपासना 








आप तो इन बासनाओंसे पीछा छुटना ही नहीं, जब पछला छूटेगा, 
आप हडाज पडेंगा । इसलिये जीनेतककी आशाको भरी 
त्यागकर सनको न्रह्मातन्दर्मे डाछ दो। एक दिन तो शरीरको . 
जाना ही है; सदाके लिये पट्टा तो लिखबाकर छाये ही नहीं थे; 
आज हीसे समर लो कि यह्द है नहीं ओर त्रह्मानन्दके सागर्में . 
शह्वारद्ित होकर कूद पड़ो। आशख़्णे यह है कि जब हम इन 
कामनाओंको छोड़ही चेठते हैं, वह मपने आप पूरी होने छग 
गऋड़ती हैं। * 
गंगातीरे हिमगिरिशिक्ा बद्धपप्नासनस्य । 
अक्षष्यानाभ्यसनविधिना योग निद्रां गतस्य ! 
कितिभोच्ये मम्र सुदिवसिरयत्र ते निर्विश्ञाः, 
कण्हूयन्ते जरठ हरिणा श्ुज्मक्षे सदीये । 
जब दिलमें त्याग और ज्ञान भरता है. ओर शान्त साक्षी बन 
फर विचारशक्ति आती द तो वही हुनिया जो सायाका परदा हो 
रही थो रामकी कांकियोंका लगातार प्रवाह घन जाती है ! 
दर्शन दाता” कहछा सकती है, एकरस अभिव्यव्जकी ह्दो 
जाती है। बह छोग जो भेदभाव और अमेद्वादके शाद्ार्थमें छीन 
हैं उनफो झराड़ने दो। उस अवस्थाके लिये यह चुद्धिकी 
छानबीन भी चयुक्त नहीं, परन्तु जब बुद्धि ( भर्थात्‌ सूक्ष्म 
सरीर )के तलसे उतरकर कारण शरीर में ज्ञानमाब॒का दीवा जलता 
है तो यह मांगे सं होते हैं और जबतक भनुष्यके अन्तर 
दंदय (मानों सातबे' परदे) में' रामका डेफा नहीं बजता त्तवतक उसे 
न उपासना ही रस देगी, न ज्ञान, न वेदकों संहिताका अर्थ आयेया, 
न अर्पानपदूका ॥। 


जैंसे भृके भूक अनाज, उपावन्त जल सेती काज । 


है 


जैसे कामी कामिनि प्यारी, वैसे नामे नाम झुरारी । 


शिवोहम भाव विता सम्यक्‌ शुद्धि रहीं होगी... ३३ 


हम राज अार जीबी ५३200 7400 47 पीएफ 3, 

* देलीफोन द्वारा प्यारेने वात कीं, टेलीफोन प्यारी छामे लगी। 
जब मोहन दूछरी जगह है टेलोफोनड्री बढ़ी छुदर है। जब 
ओहन अपने धर आ गया, तो अब टेल्ोफोनसे क्या १ बह 
मित्र, सम्केत्थी, राज, धन दौंठत सब टेलीफोन हैं, जिनके . 
द्वार राम हमसे वोढता था । जबतरू राम नहीं मिछा था, दिल 
कांपता था कि हाय | इस बिना फंसे सरेगी ? वह प्यारा घर झा 
गया, आ मिलता, अब तो हे मित्रमण। मुझको भछे छोड़ दो, 
सम्बन्धोजनो | त्याग जाभो, धन दोलत ! छुट जाओ, भाग 
जाओ, इन्जृत सम्माव ! वेशक पीछा दिखाओ, यहां बैंठे क्या 
करते हो, शजामी ! निक्राक्त दो अपने देशले, धर रखो अपनी 
दुनिया । 


राजा हठे नगरी राखे अपनी । 

मैं हर छठे, कहां जाना! 
अब दिलवर यर आया है, नेनोंका फ़री विछाऊंगी। 
गुण औगुणपर धर चिन्गारी, यह मैं धूप धुकाऊंगी। 
प्राणोंकी में तेज करूंगी, हरिको गे लगाऊंगी। 


शिवोहम भाव ( अद्वेत दृष्टि ) बिना 


सम्यक्‌ शुद्धि नहीं होगी। 
* * अशिबोहम” तो सभी करते हैं, क्या भेदवादी फ्या अमेदेवादी। 
क्या भक्त, क्या कर्मकाएढी; क्या हिल्दू क्या ओर कोई। सबही 
अपने दिलके भीतस्से अपने आपको बड़ेसे बढ़ा मानते हैं। घोर 
सावित करते हैं। वह भेदवादी भक्त जो अभी मन्दिस्में देवके सामने 
अपने तई' “लीच-पापी-अपम-सूरे कहते-फहते थकता नहों थ& 
जब बाहर बाजास्में निकछा तो उसे कोई “भरे ओ नीच] 


डे 


इ्छ- -.. रामकी उपासना 





कहकर पुकारे तो सद्दी; फिर देखों तमाशा, कचहरियोंमें क्‍या 
गंति होती दे । . ५ 

अन्दरका 'शिवोहम? कभी मर ही नहीं सकता। मरे. क्योंकर; 
साँचको आँच कहाँ ९ पर हां! अपने तई' देहादि रखकर जो 
शिव्रोहसका सुल्म्मा उपर चढ़ाता है यह -तो पॉड्ककी नाई स्ूठा 
विष्णु बनाना है। इस प्रकार तो 'वासुदेवोहमः सब छुनिया - 
अहँकारकी वोली हारा बोल रहो है। यह तो मैले ताम्रके 
पान्मसें पायस पकाता दै और ज़हरसे मर जाना दै। वेदास्तका . 
डुपदेश यह कि क्षीर तो पिया जाय, पर मैले ताम्र पात्रमें नहीं। 
देहाभिमान अन्दर और शिवोहमुका ऊपर ऊपरसे मुल्स्मा तो हो 
नहीं, वहिकि शिवोहम्‌ अन्दर हो और अन्दरसे अभिकी तरह भड़क 
कर. देह्ामिमानको जछा दे। यह हो गया तो देद्ामिम्रान; 
ऋपणता, भय-शोकको ठौर कहद्दां? इस मेंदको ( नहीं अमेदको ) 
जिसने जाना, निघड़क दो गया, उदारता सूर्तिभाद वल गया, वल- 
शक्ति ओर तेजका दरिया (नह) हो निकला। . ., 

कोई भ्री बल हो कहांसे आता है ? उस एदारताले जिसमें 
शरीर और प्राणकी बलि देनेको हम तैयार हों, सिरको हथेलीपर 
ट्थि चलें, देखो यारो ! जब “ज्योतिपां ज्योतिष:” अपने आपको 
पाया तो सिस्से गुजर जाता रूपी सूरमापन स्वतः कैसे व भा 
जञायगा ९ 

अब ज्ञूग ध्यान देकर सुनना, में तुमसे छुछ मांगता तो नहीं ९ 
भरत कहे, अनधूत्त कहे, रजपृत्त कहे, जुलहा कहे कोऊ। 
काइकी बेटीसें बेटा न व्याहं, क्ाइकी जात बिंगाड न सोऊ। 
मांगके खाऊं, स्मशानमें सोऊंलेनेकी एक न देनेंकी दोऊ। 

फिसीके ८ देने नहीं, किसोसे कौड़ी लेनी नहीं, छाग-छपेटले 


फ्या? कहुचा मातो, सचही झह्टगा,- परे 
) कट दमा, के शिखरसे 
पुशारकर सुनाता है:-- ॥ 0 


शिवोदम्‌ भाव बिना सम्पक्‌ घुद्धि नहीं होगी ३८ 


संसारकों सत्य मानकर उसमें कूदते हो, फूसकी, आगमें पच- 
पच मरते हो, यह उम्र तपस्या क्‍यों ९ इससे कुछ भी सिद्ध 
नहीं होगा। देद्धाभिमानक्रे कोचडमें अपने शुद्ध सबिदानन्दः 
स्ररूपकों भूलकर फंसते हो, दल्दलमें धंसते दो, गल जाओगे; 
ब्रह्यको वित्तारफर दुःखोंको चुलाते हो, सिर्पर गोले बरसाते दो 
मौर गुल ( पुष्प ) | गछ जाओगे। 'सत्यको जवाब वैकर मिथ्या 
नास रुपमें क्यों. घक्के खाते हो? जिनको इ्वेव माखनका पेड़ा 
सममत्े हो, यह तो चूने ( कूछई ) के गोले हैं। खाओ तो सही, 
फट जायंगी अन्तड़ियां, कूठ बोलनेवालेका बेड़ा ग्रक्‌ ! में सच. 
कट्ठता है, दुनियाकों चीजें धोका हैं । होशमें आओ, त्रह्म-दी-म्रह्म 
सत्य है! 

ज्येष्ठ आपाढ़की दोपहरके वक्त भाड़क़ी तरह तपे हुए मरस्थलां 
संकि मुनि जब अति ध्याकुछ हो रहा था; और उसमे 
पासके एक प्रासमें जाकर आरास चाहा, उस समय वरिष्ठ 
भगवावक़े दर्शन हुए। , वशिष्ठ जी कहते हैं, वेशक इस: गरमीमें 
हजार वार जल मर, पर वहां मत जा, जहां तजुके तनूरमें पड़ेगा । 
यहांपर तो शरीर ही जलता है, वहां जविद्याके वापसे सारेका 
सारा सड़े गा । हो 

वरमन्धगुद्महित्व॑ शिलान्तः कीटता परम । 
वर भरी पंगुसुगो न ग्रास्यजनसंगमः ॥ 
आप बीती कहूँ कि जग वीती ! 

जब ' कभी भूलले किसी सांसारिक बस्तुमें इष्टता वा 
अनिष्टता भाव जमाता हूँ, द्वावि-खाभ, छुटाई-बड़ाईमें दिल 
दिकाता हूं, तन्दुरुस्ती (देहकी आरोग्यता.) को बड़ी घात 
गरदानता हूं, किसी पुरुषकों अपना वा पराया ठानता हूं, कोई 
चीज, भावी व वर्तमान, सत्य मानता हैं, अर्थात्‌ शुद्ध स्वरूपकोः 


झ्द रामकछी उपासना 








मूलकर, शरोस्में जमकर सेंइरृष्ठिले देखता ओर विचार करता 
हु, वो अवश्यमेत्र तीच तापोंमें कोई नकोई आव चेरता दै। 
मरी दृष्टि थोड़ो गिरे तो ताप भो थोड़ा होता है, बहुत गिरे तो 
साथ भो बहुत। इस झ्लुद्र दण्टि ओर तुच्छ भावनाका फछ खेद, 
हुःख मिछे बिना कमी नहीं रहता। और जब देदांदि स्वप्नको 
ग्रे भगा सेद-भावनाको उड़ा आत्मदृष्ठि खोलता हुं; तो 
संसासक्े तत्त ऐसे दो जाते हैं, जेसे कझिसीके अपने हाथ-पैर, 
बजिस तरह चाहें दिला ले । प्रकृतिकी चाछ मेरी आंखोंकी कटाक्ष 
ओ जाती हैं यही कानून ओर सत्र लोगोंके छुःख-सुख लालेमें 
भी राज करता दे, इसको न जानकर लोग भरते हैं। यह कानुन 
कहीं सच्चा तू न समम्क लेना, अनाड़ोका काता हुआ यह वह 
होहेका रस्सा है. जिससे इन्द्र और सूर्य्ण भी बैंधे पड़े हैं। 
संसार-समुद्र्में चह वद्द एक पत्थरफी चद्टान है; भिसको न देख» 
फर महागजें) परिडत, देव और दातव अपने जद्दाजों ( पोतों ) को 
सोड़ बैठते हैँ । वंशोंके वंश, कौर्मोको कोमें, सुल्कॉंके मुल्क इस 
आानूनको शुछाकर मिट्टीमें मिछ चुके हैं । 
अजगरने सममा कि कृष्णछो खा ही रूंगा और पचा जाऊंगा, 
लो खा गया, पर पेटके अन्दर चलों फटारियां। खणड-मण्ड होकर 
आतिशत्राजीके अनारकी तरह अजयर उड़ गया, और कृष्ण बैसे- 
जा वैसा शेष रहा। क्या छुम इस सल्यरूपी कानूनको खासकते 
हो, दबा सकते हो, छिपा सकते हो १९ इस सत्यको 
फिस्ीझा जिद्वाज नहीं, और तो और खुद कृष्णके छुख्वाले जब 
सत्नझ्ठो मखोलमें उड़ाने लगे, और अपनो तरफसे मानों इसे 
सगइडनगड़कर रेतमें मिला भी गये तो यह सत्य मट्यामेंट 
झोकर भी कि डगा, जोर क्या ऋृष्य झोर क्‍या यादव सबके 


सपप्यो हड़प कर_गया, टारकापर पालों फिर गया। भाई! 
झुरदेझो उठाकर जो चिह्छाया करते हो य 


सच्चा उपासक डक 
“सम राम सत्य है” डे 
आज पहले ही समझ जाओ, अभी समझ लो तो मरोगे ही 
नहीं । मरनेके वक्त गीता तुम्हारे किस काम आयेगी ? अपनी 
जिन्दगीको ही भगवतछी गीता वना दो। मरते वक्त दीवा 
( दीपक ) तुम्हें क्या उजाला करेगा, हृदयमें हरिज्ञान प्रदीप अभी 
जल्य दो । ! 
कृष्ण ल्वदीयपदपडुजपत्नरान्ते । 
अग्यैव में विशतु मानसराजहंसः ॥ 
रे 
आगप्रयागसमये कफवातपित्त! । - 
कण्ठावरोधनविधौ स्मरण कुतस्ते ॥ 


पतितः पशुरपि कूपे निः्सर्तु चरणचालन छुस्ते | 
धिक्‌ त्वा चित्त भवाव्येरिच्छामापे नो विभर्षि- निःसतुम्‌ ॥ 

एक जुलाद्दा भूकों मर गया, उसकी मां मुरदेके मुह और 
पायुक्ो पैसेका थी लगाकर सबको.दिखाती. थी, देख लो ! मेरा 
पुत्र भूका नहीं मरा, घी खाता और घी त्यागता गया दै। प्यारे! 
उधारी मुक्ति तो जुलाहेका घी है। राकड़ सुक्तित ( नकद निज्ञात ) 
जीवन-मुक्ति, जब मिल सकती है, तो क्यों न लेनी ९ हि 


पं सच्चा उपासक 
, भाई ! सच्ची कहें, उपासक और सक्ष्त दोनेकी पददी हमको 
तो नप्तीतर नहीं । हमने तो सच्चा डपासक सारी दुनियांमें एकः 
ही देखा हैं। बाकी भक्तों, ऋषियों, झुनियों, पीरों, पैगुम्बरोंका 
“प्रेममय उपासक” कहलाना एक कहने हीक्ी बात है। वह 
सच्चा आशिक और उपासक कोन है १ जिध्को लोग_ उपास्यदेव 
कहते हैं । क्योंकर १ प्रेमो जार (यार ) की तरह छिप-छिपकर 


चल रामकी छपासना 








छेड़ता है; शनें:-शने: द्क्तिकी कन्‍नी ( चित्तका आंचल ) खींचता 
है, अनेक प्रकारके भेप बदलकर, रंग-रूप धारण करके, स्वांग 
अरके परदोंकी ओटमें नयनोंकी 'चोट मार जाता है, जब सन . 
अनात्मपदाथोमें कहीं छा जाता है तो, दवा, फिर घसके मान करने 
ररूठनेका) क्‍या कहना ] भ्रकुटी कुटिक किये कैसा-कैसा कोप 
दिखाता है। जब चइत्ति-मार्गस कहीं रुकजाय तो चुटकियाँ 
अरता है। दम तो छेमे नहीं देता, जाराम तो नामको भी ओर कहीं 
नहीं मिलने पाता, सित्राय एकर सात्र उस रामकी निष्काम शय्याके 


दे प्यारे | अब आशिक होकर रूठना ( मचलना ) केसा ९. 
अब रस चखाकऋर नहते हो हे प्राणनाथ ! इधर देखों ! वह 
छुप्ट शिशुपाछ् आ पड़ा, छोनकर छे चला तुम्दारी रुक्मिणीको। 
4 शर्म भी दे १ यह तो वक्त सान करनेका नहीं, आओ 
ज्आाओ | 


स्वमसि मम भूपणं,स्वमसि मम जीवने,त्वभसि सम जलूघिरलं 
अवतु भवतीद ससि सततमसुरोधिनस्तत्र भम हृदयमतियले 

सूर्स्यंको चारद महीने तेज प्रकाश दे दिया मुफ़्तमें ॥ हमको 
आठॉपहर निज्नानन्दमें देते कड्डाल तो नहीं हो प्वले । 

. ै प्र्भो ! अथ तो मुझसे दो-दो बाते' नहीं निभ सकती । खाने- 
"पीने, फपडे-कुटियाका भी ख्या७ ग्ख ओर ठुलारेका भी सुख 
देख, । च्हेमें पड़े पहनना, खाना-पीना, जीन-मरना, इनसे मेरा 
'निर्दाह दोता है १ मेरी तो मधुकरी हो तो तुम, कामछी हो तो 
चुमः छुटी हो तो तुम, ओपधि हों तो तुम, शगैर हो तो तुम; 
आत्मा हो सो तुम । शरीर आदिको चाहते हो तो पड़े रकखो । 
अफर्ता घन रहे हो, निफस्मे थेंठे क्या करते हो ९ सेशा करो | 

आंखें लगाके तुझसे न पलकें हिलायेंगे ) 
देखेंगे खेल दम, तुम्हें आगे नचायेंगे ॥ 


उणसनाके मन्त्र ३५९ 
बय सोम ब्ते तब मन्स्तनूयु विश्रतः ॥ यजुः॥ 
तुम्हरी खातिर हे अभो ! यह मन था तन बीच ॥ 
ले छो अपनी चौनु। वारकर फ़रेक दो अपने “बेनाम” पर। 
घाढी भर-भरकर हीरे, जवाद्विरात, तुकपर बार वारकर फेंके 
गये, जिनको लोग तारे नक्षत्र॒म्रह चांद सूर्य्य और पृथिवियां * 
कहते हैं। ढुठ लो ज्योतिपियो, लूट लो तत्वविज्ञानियो, लूट छो 
सोदागरो, राजाओ, छूट लो । पर हाय ! मार डाछो, तोभी में तो 
यह माल नहीं छूगा। डोलोपर वार बारकर फे का हुआ टका 
रुपया लूटना कोई और लोगोंका काम है। मैं तो वही छूगा, 
चही ! परदेवाला, दुलारा, प्यारा। 
उपासनाओे मन्त्र 
उोसीर उस उपासनाकी होती दै जो दिलले निकछे। गले- 
के ऊपर ऊपरसे निकले हुए डपासनाके वाक्य तो मानों मस्तौल- 
घाजी है. और परमेश्वरफो झुटलाना है। जेसी चित्तकी अवस्था 
होगी, सश्ची उपासनाकी वैसी लूरत होगी । 
(१) विद्यार्थीकी प्रार्थना 
(क) ये 'िषप्ताः परियल्ति विश्वा रूपाणि पिश्रतः । 
वाचस्पतिबंल। तेपां तन्‍वो अब दधातु मे ॥ 
* पुनरेहिं वाचस्पते देवेन मनसा सह । 
वसोष्पते निरमय भग्येवास्तु मयि श्रतम्‌॥ 
. इहैवामिव तनूभे भर्ती इसज्यया । 
वाचस्पतिनियच्छतु सय्येवास्तु मयि अतम्‌ ॥ 
. उपहतो बाचस्पतिरुपास्मान्‌ वाचस्पतिव्हयताम। 
संश्रुवेत गमेमहिंसा श्रतेन विराधिषि ॥ 


छ6 रामकी उपासना 





इसमें वाच ( वाणी ) के पति ( वाचस्पति ) रूप ब्रह्मका 
ध्यान है । जब लोहा अम्रिमें पड़ा रहे; अग्नमिके शुण उसमें आ जाते 
हैं, इस तरह जब बुद्धि वाच्‌ ( वा मच ) के पति सर्वन्यापी चेतल्च- 
कुछ काल असंद रहे; तो उसमें विचित्र शक्ति कीन आा 
ज्ञायगी ! 
कोई भी मन्त्र हो, उनको खाली पढ़ या गाद्दी नहों छोड़ना, 
किन्तु पढ़कर उतके भावार्थमें मनक्ो छीच और श्ान्त होने देना 
चाहिए । 


(ख) यज्जाग्रतो द्रसुदेति देव तदुसुप्तस तयैवेति । 
दर ज्योतिषां ज्योतिरेक तन्‍्मे मनः शिवसझूल्पमस्तु ॥ 
भात्रार्थें--क्या जाप्रत, फ्या स्वप्न, क्या सुपृप्ति--तीनों दुशामें 
मेरा मन किसी कौर विचारकी तरफ व जाने पाये, सिवाय शिव- 
रूप आत्मचिन्तनके, चलते फिरते बैठे खड़े मेरा शिवरूप सत्य 
स्वरूप आत्माके सिवाय ओर कोई चिल्तन न करने पाये.। इसी 
प्रकार शु० यज्भु; ऋ० ३४ के झगड़े पांच मन्त्र भी यही भाव प्रगद 
करते हैं । 
(ग) है भृज्ुवःस्त्रस, तत्सविदुर्षरेण्य भ्गों देवस्प धीमहि 
घियो यो न अचोदयात््‌ ! 


यहांपर पहिले नो यह देखना दे, कि “धीमहिं! और नः 
दे न बढुवचन ६ । एकास्तमें अकेले तो इस त्रह्म गायत्नीका ध्यान 
दे और “हम ध्यान करते हैं? “हमारी बुद्धियाँ” ऐसा क्यों। 
“मे ल्यान करता हू” और "मेरी छुद्धि? क्यों नहीं लिखा? 
इसमें बेइकी आ्षा यूं दे, कि प्रबम तो देहासिमात रूपी स्वार्थ 
रे चर परिन्छिन्नताओंको परित्याग करता दे। सत्र देखके 
व्मेको अपनासखरूप जानकर, सब. स्ारीरोंको अपना शरीर 





उपसनाके मन्त्र छ९ 


मानकर, सबके साथ एक दोफर असेद बुद्धिके साथ यह ध्यान 
फरता है-- 

“बह सबिनृदेच जो हमारी बुद्धियोंकों चलाता है; उसके प्रिय 
( पृश्य ) तेज ( स्वरूप ) का हम ध्यान करते हैं ।” 'प्रचोदयात'में 
मदीघर ओर सायणाचाय्थ्रेले व्यय्यय माना दे और यह ठीक भी है। 
सूह्य रूप सवितरेवकों हमारी बुद्धियोंछ्ा प्रेरक माना है। वही जो 
सूस्मकों प्रफाश फाता है, बद्दी चुद्धियोंका प्रकाशक है। वो आत्मा है। 

यो>प्तावादित्वें पुरुप8 सोउसावहम्‌ ॥ ( यजु० सं० ) 

उम्रका ध्यान फरनेसे प्या छाभ ! 

बड़ी आपडा आन पढ़ी और सल्ध्या करते समय परमेश्वर्को 
मूटलाया नहीं, फिन्तु सचूभुष वारवार देह-हप्टिको छोड़कर 
शो यह ध्यान किया कि"में' तो सूब्यके प्रिय तेजवाछा हू'। मेरा 
तो कही धाम है,” तो कहिये, चिन्ता जल न जायगी | प्रतिदिन 
तोन वक्त, था दो वक्त या एक काढद्दी सह्दी, सच्चे भावफे साथ 
जो इस तत्वम लीन हुए कि "इन बुद्धियोंका प्रेरक आत्पदेब 
मैं तो बढ़ी ह' जिसका तेज छुग्ये चन्द्रमामें चमक रहा है,” 
हो कद्टिये फौनसा अन्थेरा खड़ा रह सकता है ? विद्या पढ़ रहे 
हैं था कोई बड़ा कार्य्य हाथमें है, ओर हर दिव एकान्तमें बैठ 
घेंठ और सब वरफसे घृत्तिको सच, तेजफे पुजमें असेद भावना 
करते हैं, तो यारो ! 5हाई है! अगर यश और कीर्ति खिंचकर 
हुख्दारे आगे नृत्य न पड़ी फरे' | क्या खछ क्तुमय: पुरुष: श्र तिने 
भूठदी कद्द दिया था ९ 

(६ ) जब चित संसारमें दूध जाये, कानून रूद्दानी टूट जाये, 
पाप कर्म हो जाये, आत्मदेव भूल जाये तर आँसू भरे नयन, जोदू 
हुए द्वाय; रगड़ते हुए घुटने, माटीमें घिसता हुआ माथा, जछ्ता 
हुआ दिल, यदि इस प्रकारकी उपासना करे; तो बह कौनसा 
प्राप दे; जो घुढ न जायगाः-- 


छ्र्‌ रामकी उपासना 





मोएु वरुण सन्मर्य शुई राजलह गसस्‌ । झंडा सुक्षत्र सडय ॥ 
यदेमि अस्फुरलनिव दतिनध्मातोंअद्विवः । सडा सुक्षत्र सडय ॥ 
कत्वः समह दीवता अत्तीए जगसाझुते । सडा सुक्षत्र मृडय । 
अपां सथ्ये तख्ियांस तृष्णाविद्ज्ज रितारम्‌ खड़ा सुक्षत्रसुडय ॥ 
यत्किचेद चरुण देव्ये जनेउभिद्रोह मलुष्याः३ अरामसि । 
अचित्तीयत्तवध्मा युयोपिसमानस्तस्सादेनसो देव रीरिपः।) 
( क्रूक० में० ७ सू० <६ ) 
सोनेका गढ़ छोड़कर, धरे न कांटों बीच! 
हीरे मोती फेंककर, छेंऊे न मादी-कीच ॥ 


अब दया ! है राम ! अब दया ! में भूला, में जड़ा, मैं पढ़ा, 
में गिशा, में मरा । अब दया ! है राम | अब दया ! 

(४) जबतक देहमें प्रीति ओर किसी प्रकारदी फामना 
यनी र३ती है, तबतक तो मेंद-उपासना ही दिलते निकलेगी। 


प्रेम-अतुसग जब बहुत बढ़ेगा तो उपासनाकी यद्द शक्ल हो 
जायपा। 


ते तथा भग प्रविशानि स्वाहा । समा भग प्रविश स्वाहा । 
तस्मिन्सहसशाखे | नि भगाई स्वयि सजे स्वाहा । (वैति०) 


चद भेद एपासना इच्चत्तम श्रेणीक्रो पहुंच जाय तो इसका 
अंग झुछ थ॑ होगा । 


गणानां त्या गणपत्ति ७ हवामहे । प्ियाणां त्वा 
ग्रियवति ७ दृवामहे। निध्ीनांत्वा निधिपति ७ इवामहे । 
पसी मम, आहमजानि गर्मध मा त्वमजासि गर्मथम ॥ . 
(यज़ु० संद्िता) 


इपासनाओे मन्त्र धर 
हैं गेकर यह तकरार-इ-उलफत तो ठुक्नसे । 
कि इतनी यह हो मेरी किस्मत तो तुझसे ॥ 
मेरे जिस्मों-वांमें हो हरकत तो हुक्लसे। 
उड़े मा, मनीकी वह शिरकत तो तुझसे | 
मिले सदका होनेकी इस्जत तो तुझसे । 
सदा एक रहनेकी लब्जत तो तुन्नसे ॥ 
रफीकंमें गर है मुरध्वत तो तुझसे। 
अजीजोंम गर है मुहब्बत तो तुझसे ॥ 
खजानोंमें जो छुछ है दौलत ते तुझसे। 
0०. 5 |. 
अमीरोमें है जाहो-सोहत तो तुझसे ॥* 
हकीमोंमें है इलमो-हिकमत तो तुझसे | 
है रौनक जहां या है बर्कत तो तुझसे |। 
महे चन स्वामद्रिवः परा झुल्काय देयास्‌ । 
न सहस्राय नायुताय वलियों न शताय शतामध ४ 
(४ ) पर हां, जो छोग सदाके लिए निचले दर्जेकी उपासता- 
का पेशा बता छेते हैं, वह अनर्थ करते हैं, क्योंकि झगर कोई 
प्रार्थना एक दफा मी सच्चे दिलसे निकली होती तो कोई वजह 
नहीं कि चित्तकी अवस्था दल न गई होती और दिलका दरजा 
चढ़ न गया होता । यदि मन दूसरी क्लास (दरजे ) में चढ़ 
गया, तो फिर पहिली क्लासमें रोना क्यों ? यदि नहीं चढ़ा, तो 
बह प्रार्थना मूठ बकवास थी, अब भूठी बकृबककों पेशा बनाया 
चाहता हैं। डपासनाका परम प्रयोजन यह था कि शरीरके 
स्नेहसे चित्त मु और आत्मा संग जुड़े। सच्चे उपासककों जब 
डरीरसे हुआ अपराध याद जाता है तो वह सांसारिक अपने 


भ्र्ट . रामकी उणसना 





आप' से भागना चाहता है। हरिको शरणमें आता दे और 
आत्मासे उदाकारता पाता है । झेसा ध्याव एक दुफा नहीं, दो 
दफा भी हो जाय तो फायदा है, कोई डर नहीं। परन्तु जो 
छोग "पापोहं पाप कर्माहँ पापात्मा पाप सम्भवः” को प्रदि दिन 
पड़े ही रबते हैं, उनको इस प्रकारकों आवृत्ति न केवछ देंहसे 
सस्व॒न्ध पका देती दे, बल्कि पाय-संस्कार मनमें उढ़ जमा 
देती है । 

शुद्ध अन्तःकरण और सच्चे हृदयवालोंसे सेद-उपासना कभमो 
दो ही न सकेगी, जैसे एम० ए० क्लासके विद्यार्यीका जी मिडिल 
क्ल्यसवालोंकी पुस्तकॉमें कभी छा। हो नहीं सकता | 


ज्ञानी 

अब जूरा चोकस्ते होकर सुननेका समय है। छो, अब फिर 
फो़ते दें भांडा । निर्मघता, जीवस्मुक्ति, साम्राज्य, स्वगाज्य और 
फिसीकोी कभी भी नहीं नसीय होतें, खिवाय उसप्त पुरुषके ज्ञो 
अपने आपको संशवरहित होकर पूर्णश्रह्म सब्चिदानल्द निल्य 
मुक्त जानता डे, जो सर्वत्र अपने दी स्वरूपको देखता है। क्‍यों 
हिलेगा इसका दिल जो एक आत्मदेव बिना कुछ और देखता 
दी नहीं | बड़ा भवानक, घोर शब्द हुआ; पर सिंह क्यों डरे, 
बह सो सिंदकी अपनी ही गर्ज थी | छोड़ा तत्वारके जौहरोंस 
क्या भय माने, बद तो उसोके तेज चमत्कार हैं। अप्रि अपनी 
ज्वालास आप क्या संत्म हो | तारे टूट पड़ें, समद्र जल उठे, 
हिमालय उड्ता फिरे, सुस्ये मारे उंढक बर्फका गोझछा बन जाय, 
आस्मदर्शी शानवानको कया देरानी द्वो सकेगी, जिसकी आज्चासे 
कुछ भी धादर नहीं हो सकता * 

तंत्र को भोहः कः शोक एकल्वमसुपध्यतः ॥ 

अपि झीतरुचावके सुतीक्ष्ण चेदुमण्डछे। 














ज्ञानी एव 





अध्यधः असरत्यरनों जीवन्पुक्तो न विस्मयी ॥ 
प्रलयस्थापि हुंकारेमेहाचलूविचालकैः । 
विक्षोम नेति तस्यात्मा स महात्मेति क्रथ्यते ॥ 


भेदमावना दिलसे छोड़ | निर्भय बैठा भृंछ मरोड़ ॥ 

सूर्य उसके हुकुमसे जड्वा दे; इन्द्र उश्तीका पानी भरता है, 
पवन उसीक्षा दूत है, उसीके आगे दरिया रेतमें माथा रहते हैं, 
गर्ज-महराजे, देवी-देवता, वेद-किताब जो कुछ भी है एक आत्म- 
दृशीका संफह्पमात्र दै। तीनों भुवन और चारों खानि जछ्छ है 
जिनमें रौनक केवल .एक खंतत्य पुुपरूप ज्ञानत्ानकी प्रिललोकी 
लाटेन है, जिसमें ज्योतिरूए ज्ञानवान्‌ है। चौदहलोक ' एक शरीर 
है, भाग जिसका ज्ञानवान्‌ है।वस वह्दी सत्‌ है ओर कुछ भी 
नहीं। प्रध्वी अन्न पैदा करती है कि कमी श्रह्मनिष्ठके 'चरण 
पड़ें। ऋतु घदढछते हैं क्रि कमी आत्मस्वरूप महात्माके दर्शन 
नलीव हों । “सुरतिय, नरतिय, चागतिय,” इन सबको उद्रमें 
बोझ उठाने पड़े, वेदना सहती पड़ी, उस एक अज्ल, अमररूप 
ज्ञानीकों प्रकट देखने से लिये | दुनियाके राज्य काज उसके छिए 
थे, चह आया तो राज्यकांजोंकी ड्यूटी (कर्तेन्य )पूरी हुई। 
घर बन रहे थे, कपड़ें ठुने और पहने जा रहे थे, महानिएरक्नी 
पधरावनीके लिए। वह आया; सथ॒ परिश्रम सफल हो गये । 
रेडें चछती थीं, पोते बहती थीं, कभी बह्मनिष्ठतक पहुंचनेके 
छिए। बुद्ध होते थे, लोग मरते थे, कभी नीकयुजती साभेके 
लिए । नाना विधि विकास एक ज्ञानवान्‌ फलकी खातिर था। 
उपासना; प्रार्थेना, मक्ति, नाक रुगडूना, आठ आठ आंसू रोचा, 
प्रेमकी जरदी (पीछापन ) कबतक थी, जबतक ज्ञावको छाल्री 


नहीं आयी। ; ; 
अक्षविद इच सोम्य ते मुख भाति ॥, 


७६ शम्रकी उपासना 


प्रसंस्यान 
अमभेद उपासनाकी विधि-मनन निद्ध्यासन | 
शाल्बमेंसे उन वाक्योंको चुन लिया; जो मनमें खुबते, 
चित्तमें चुभते हैँ और उनको एकान्तमें बैठकर नीचे दिखाई 
विधिसे बरता। जैसे शह्ूडरके मात्मपश्चक स्तोन्रको के लिया: 
नाह देहो नेंद्रियाण्यंतरंगस्‌ । 
नएहँकरः भाणवर्मो न बुद्धि: ॥ 
दारापत्यक्षेत्रवित्तादि दूरः । 
साक्षी नित्य प्रत्यगात्मा शिवो5हम्‌ ॥ 
भावार्थः--तहीं देह इन्द्रिय न अन्तःकरण | 
नहीं चुद्ध्यहकार वा आण मन ॥ 
नहीं क्षेत्र, घर वार, नारी न धन । 
मैशिव हूँ, में शिव हूँ, चिदानन्द घन । 
च्योथे पादको दिलमें चासम्वार ठुहराया, और नोचे दिखायेहअचु- 
सार विचारपूर्वक दोहराते गये, यद्दांतक कि मन शिथिल हो जाये । 
निसश्तन्देह ऐसी तदकीकात ( मीमांखा) जिसमें विकल्प 
कभी स्वप्ममें मो युक्त नहों, म॑ देह आदि नहीं, फिर देहअ्रमको 
अपनेम फ्या आन दुगा ९ देह अधभ्रिमान कसा युप्त दलीलकी 
छड़दन फरना है, मद मृझाता, बेअकछी है । 
भेशितर हैँ, में शिव हूँ, चिदानन्द घन 9 
निस्सन्देद येद, बेदान्तका अन्तिम निप्कर्ष और कुछ 


घेद और खनशास्त्र सुककझो देह आदिसे सिन्‍म चधाते हैं, मेश 


अपने तई' देद्ू आदि ठानता घोर नास्तिक बनाना दै, यह झपराध 
मे फ्यों छझरम ९ 












प्रसंख्यान घर 





में शिव हूँ, में शिव हूँ, चिदानन्द घन ॥ 
गुरुजीने मुझे अपने साक्षात्कारके बलसे कहा; “में देह आदि 
नहीं”, फिर मेरा देह अभिमान रखना पूज्यपाद गुरुजीके मु 
और जूबानपर जूते मारना है। हाय! यह उपद्रव में 
करू । 
मैं शिव हूँ, में शिव हैं, चिदानन्द घन ॥ 
शरीर आदिकी पीड़ा, सम्बन्ध, लोगोंकी ईर्पा, हंष, सेवा, 
सम्मानसे मुझे क्या ९ कोई बुरा कहे, कोई भा कहे, में एक 
नहीं मानूगा। जो आप भूले हुए हैं, उनका क्या भरोसा ९ 
केवल शास्त्र और प्रमाण ही माननीय हैं, मुझमें कोई पीड़ा नहों, 
कोई शोक नहीं, ईर्पा नहीं, राग नहीं; जन्म नहीं, मरण नहीं, देह 
नहीं, मन नहीं । 
में शिव हैँ, में शिव हैं, चिदानन्द घन॥ 
में शिव हूँ, में शिव हूँ, चिदानन्द घन ॥ 
में शिव हैं, में शिप हूँ, विदानन्द घन ॥ 
मां छोटे बच्चेको जाम्रफल खेंडनेको देती है। दच्चा दस्तूरके 
सुवाफिक्‌ दायसे पकड़कर सुंदके एस छे जाता है; ओर छगता 
है चसने। चूसते बूसते आखिर वह फल फूट पड़ा और बच्चेके 
हाथपर, मुहपस कपड़ॉपर रस दी रस फछ गया | अब तो न 
कपड़े याद हैं न मां याद दै, न द्ाथ सुहका “दी द्ोश है, रस रूप 
हो रहा दे । इसी तरह श्रुतिमाताका दिया हुआ यह पका 
हुआ महावाक्य रूपी अमर पछ शएकान्तमें अन्तःकरणके साथ 
बुद्दसते-दुद्दराते डुहराते दुद्दराते-आखिर फूड पड़दा हब और परमानन्द 
समाधि.आजाती है।. ० 
आवृत्तिरसकृदुपदेशात्‌ ॥ अद्यसूच्र० ४-१-१ 


हद शमकी उपासना 


जब सर्वदेश अपने आत्मामें पाने छोे, तो परोक्ष क्या रहा 
और स्थान-सस्वन्धी चिन्ता क्योंकर उठे ? जब सर्वेकालमें अपने 
तई' देखा, तो कल्न परसों आदिकी फिक्रर कहां रही १ जब से 
मनुण्य और पढ़ार्थ सचमुच अपना ही रूप जाने गये तो यद्द 
घड़का कैसे हो क्रिहा! जाने अमुक पुरुष मुझे क्‍या कहता 
होगा ! जब कार्य्य-कारण-सत्ता आप हुए, तो वित्तद्षत्तियोंका 
चेड़ वैसे न डुबे ? मन पारा खाये हुए चूहेकी तरह हिल्‍ने 
डुलनेसे रद जायगा--मारनों चित्तके बच्चे हों मर गये। सहज 
समाधि तो स्वयं होनी ही होगी । 


कया सोच, क्या समझे रास ? तीस कालका वा क्या काम 
कया सोचे, क्या समझे राम ? तीन छोक नहिं उपजा धाम | 
नित्य तृप्त सुख सागर नाम, क्या सोचे क्‍या समझे राम * 

इस सिस्‍्से गुजर जानेमें जो खाद, शान्ति और शक्ति आते हैं, 
बद्दी ज्ञानता है, जो इस रसको चखता दै। राजा जनकने यह अम्रत 
शीकर अपना अनुभव यू वर्णन किया हैः-- 











नाहमात्मार्थमिच्छामि गन्धान्प्राण गतानपि। 
तर्मान्मे निर्जेता भूमिरवश तिप्ठति नित्यदा॥ 
नाहमात्मार्थमिच्छामि रसानास्येडपि चत्ततः | 
थापा मे निर्मितासतस्माइश विहटन्ति मित्यदा॥ 
नाहमात्मार्थमिच्छामि रूप ज्योतिश ' चश्षप: 
तस्मान्मे नि्जित ज्योतिवश विष्टति नित्यदा ॥ 
नाहमात्मार्थ मिच्छामि रपशोन्‌ स्वचि गताथये । 
तस्मान्म निर्नितो वायुरवशे तिष्ठति नित्यदा॥ 


प्रसेस्यान 


नाहमात्मार्थमिच्छामि शब्दान्‌ श्रोत्रगतानापि । 
तस्मान्मे नि्जिताः शब्दा पश्षे तिष्टन्ति सर्वदा ॥ 
नाहमात्तमार्थमिच्छामि मनो नित्य सनोउन्तरे। 
मनो में निर्मित तस्माह्शे तिष्टवि सर्वदा॥ 
हे ( महाभारत ) 
उठ अनुवादू-- 

अपने भजेकी खातिर गुल छोढही दिये जब । 
रूए जमीके गुलुशन सेरे ही घन गये सब ॥ 
जितने जुबांके रस थे कुछ तर्क कर दिये जब। 
बस जायके जहांके मेरे ही वन गये सब ॥ 
ख़ुदके लिए जो महसे दीदोंकी दीद हटी। 
ख़ुद हुस्‍्नके तमाशे मेरे ही बन गये सब ॥ 
अपने लिए जो छोड़ी ख्वाहिश हवाखुरीकी । 
बादे-सवाके झोंके मेरे ही बन गये संब्‌॥ 
निजकी गरजको छोड़ा उननेकी आरजूकों । 


अब राग और वाजे मेरे ही पन्र गये सब ॥ ह 


जब वेहतरीके अपनी फिक्र-ओ-ख्याल छूटे। 
फिक्र-ओ-खयाले रंग मेरे ही बन गये सब ॥ 
आहा ! अजब तमाशा ! मेरा नहीं है कुछ भी 


हू 





दावा नहीं जरा भी इस जिस्म-ओ-इसम परही॥ - 
: ये दरर-्ओ-पा हैं सबके आंखे यह हैं तो सबकी| , 


: दुनियाके जिस्म लेकित्र मेरे ही बन गये सब ॥ 
है. 


च6 रामकी उपासना 


अहईँ भसुरम्र सर्व्यधाई, कक्षीदां ऋषिरस्मि विम्रः । 
हें ऋत्समाजुनेयन्यूजजेई कविव्शना पश्यतामा ॥ 
अहे भूमिमददासायों याह इंष्टि दाझ॒पे सर्त्याय । 
अहमपो अनय नावशान्त मम देवासो अजुकेदमायन्‌ ॥ 
प्रणव ( छें& में इन मन्‍्त्रेफे अर्थका रह्आः भरकर, अर्थात्‌ 
कं! को महावाक््य (क्रझास्मि ) का अर्थ देकए जपता, याना, 
खासमें भरना, चछते-झिरे चितत्रनमें रखता, अप्य-साक्नात्कारका 
बहुत घड़ा साधन है ॥ 
पक स्त्री ( वाकू ) अपने स्वरूपको जानकर यू गाती दैः-- 
रुंद्रेमियंस मिथ्वराम्यदमादित्यरुत विश्वदेवेः | 
अद्दे मित्रावरुणोभा जि मभर्म्वेहमिन्द्रात्री अहमशिनोभा ॥ 
अई सोममाहनसं विभर्म्यहं त्वश्टारमुत पृषण्ण भर्ग । 
अर दधामि द्रविणं दृविप्सिते सुप्नन्येश्यलमानाय सुन्वते ॥ 
अड़े राष्ट्री संगसनी बसूनां चिक्रितुपी प्रथमा यज्षियानाम्‌ | 
मा मा देवा व्यदधुः पुरुषा भृरिस्थायां भूर्यावेशयन्तीस ॥ 
भया सो जन्नमत्ति यो विपच्यति, 
यः म्राणिति य ई शणोत्वुक्तम्‌ । 
अमन्तवा मां त उ पक्षिबन्ति, 
अुविरततः अद्धिवे से बदामे ॥ 











प्रस॑ंहयान ५१ 





अहं रुद्राव धहुरातनोमि। 
बह्म दिये शरवे हस्तवा ठ। 
अं जनाय समद कृणो- 
स्यह चावा एथिवी आविपेश | 
अहं सुबे पितरमस मूर्ध- 
न्मम य्ोनिएपस़रन्तः समुद्रे ॥ 
वतो वितिए इबनानि विशा, 
वागूदां वर्भागोपरशशायि ॥ 
अहमेव वात इन प्र 
चाम्यारभसाणा झुबनानि विल्वा 
परो दिवा पर एना एथिवी, 
एवावती महिला सैभभूव ॥ 
| खू० वे? मं० १५ सूक्त ए२५ 
गुल दिलते हैं, गाते हैं रो रो बुढ बुढ। 
कया इसे हैं नाले नदियां ॥ 
रंगे-शफक घुलता हैं, बादे-सवा चलती है।, 
गिरहा है छम छात्र बारां ॥ 
मुक्में ! हुकमें ! झझ्षमें ! 
करते हैं अज्लम जय मग, बठता घूरन थक घक। 
सकते हैं. बाग-उ-वियातरां ॥, 
बसते हैं लन्दन पैरिस, पुजते हैं काशी मका । 
चनते हैं जिन्रत-उ-रिजवां ॥ 


दर -रमकी उपासना 





मुझसें ! झकमें ! मुझमें ! 
उददी हैं रेलें फर फर, बहती हैं वोटें झर झर 
आती हैं आंधी सर सर॥ 
लड़ती हैं फौजें मर मर. फिरे हैं योगी दर दर 
होती है पूजा दर हर ॥ 
झुन्नमें ! मुन्नम ! झक्नमे 
चरखका रद्ग रसीला, नीला नीला । 
इर तरफ दमकता है ॥ 
कैलास झलकता है, चहर ढलकता है | 
चांद चमकता है ध 
मुझमें ! मुन्नमें ! मन्नमे ! 
सब वेद ओर दर्शन सब मजहब | 
इुरान अज्लील और त्रिपिद्क्ता । 
बुद्ध, छोकर, ईसा और जहमद | 
था रहना सहना इन सबका ॥ 
मुझमें ! मन्नमे ! मुझमें | 
थे कपिक्र, कंयाइ, और अफरातं। 
ईस्पस्सर, कन्‍्ट आर प्ेल्टन | 
श्ाराम, बुविष्टिर, इसकऋन्दर । 
दिक्रम, कसर, लिययब, अकबर !! 
सुन्नम ; म्ञ्में ! प्श्म्म 
आने पीछे, ऊपर नीच । 
जाहर बानन पं ष्ठामंआ 


असंख्यान ष्ू 





माशुक और आशक, शाहर मजस। 
बुरू घुल गुलुशन, में ही में ॥ 
इन्द्र ( राजा ) के आनन्दका समुद्र यू' गर्जता है :-- 
इति वा इति में मनो गामखे सहुयामिति। 
कुवित्सोमस्यापामिति ॥ 
अबाता इव दोघत उन्मा पीता अंसत । 
कुवित्सोमस्ापामिति ॥ 
उन्प्रा पीता अयंसत रथमश्या इवाशवः | 
छुवित्सोमस्थापामिति ॥ 
उपमा मतिरास्थित वाश्रा पृत्रमिव प्रियम्‌। 
कुवित्सोमस्याप।म्रिति ॥ 
अहं स््टेव बन्धुरं परेचानि हदा सतिम। 
कुवित्लोपस्यापामिति ॥ 
नहि में अध्षिफ्चनाच्छांत्सुः पश्चक्ष्टयः | 
कुवित्सोमस्वापामिति पे 
नहि में रोदसी उसे अन्य पक्ष चन ग्राति। 
क्ुवित्सोमस्थापामिति ॥ 
अभिययों महिना, शुवमी ३ मां एथियीं महीम्‌। 
कुवित्सोमसापामिति ॥ धुल 
हन्ताई शथिवीमिमां निदधानीह बेह वां!। £ 
झुवित्पोमसापामिति (१ 
ओपसभित्यूथिवी मह जंघनानीह वेह वा | 


श्र्छ 


गमकी उपासना 





कुविस्सोसस्थापामिति ॥ 
दिदि में अन्यः पक्षो ३ घो अन्यमचीरृपस्‌। 
कुवित्सोमस्थापामिति ॥ 
अहमास्मि महामहोमिनस्यमुदीपतः । 
छुवित्सोमस्थापामिति ॥ 
शहोयाम्यरंकृतो देवेम्यो हज्यवाहनः । 
कुवित्सोमस्पापामिति ॥ 
ऋ० मण्डल १० सु० ११६ 
थीता हैँ नर॒ दरदम, जान सरूरपे हम।. 
हूँ आसमई पयाका, चह शराब-ह-नरवाला ॥ 
है जीमें अपने आता, दूं जो है जिसको भाता। 


5 


पी झुलाम घोदे, जेबर जमीन जोदे॥ 


४५. 


जो है जिसको भाता, मांगे बगेर दाता । 


थ 


पीता हैँ नर हरदम, आम-इ-सरूरपै हम ॥ 


र कोमकी दुआयें, हर मतकी इल्तजायें । 
आती ई पास भेरे, क्या देर, क्या सब्रे ॥ 
जैसे अड़ाती. गायें, जद्धलसे घरको आये। 
भीठा हैँ नर इरदम, जाम-इ-सरूर पे-हम ॥ 
सब ख्वाहिश नमाजें, गुण, कर्म, औ मुरादें 
दाथेमिं हूँ फिराता, मेमार जैसे इटें ॥ 
हाथोमे हैं घ्रमाता, दुनिया ह£ यूँ चनाता। 
पीता है नूर इस्दम, जाम-इन्सरूर  पेंइम ॥ 


23 ऊ 2६ #' 
5; 


्प 


प्रसंस्यान 





दुनियाके सब बखेड़े, झगड़े फसाद झेड़े। 
दिलमें नहीं रहकते, न निगहकों चदल संकते ॥ 
गोया गुराल ई यह, सुर्मा मिसाक हैं. यह। 
पीता हूँ नूर दरदम, जाम-इ-सरूर पैहम ॥ 
नेचरके छाज सारे, अहकाम हैं हमारे। 
क्या भेहर क्‍या सितारे, हैं मानते इशारे ॥ 
ह दस्त-ओ-पा हर इकके, मरजी प जैसे चते। 
पीता हूँ सर हरदम, जाम-इ-सरूर पे-हम ॥ 
कशिशे सिकलकी कुदरत, मेरी दे भेहरो उलफत। 
हैं निगाह-इ-वेज भेरी, इक नरकी अन्धेरी॥ 
बिजली, शफुफ, भगारे, सैनेके हैं शरारे। 
पीता हूँ तर हरदम, जाम-इ-सरूर पे-हम॥ 
मैं खेलता हूँ. गे़ी, दुनिया है गेंद गोही। 
ख़्वाह इस तरफको फेई/ख्वाह उस तरफ चहादूँ ॥ 
पीता हैँ जाम हरदम, ना सुदामा घम धो 
दिन रात तरन्नम, हैं शाह-इ-राम पेगम॥ 
किंकरोमि स्व गच्छामि किंगृहणामि त्पजामि किय््‌ 
आत्मता पूरित विश्व महाकस्पाम्बुना यथा 
सवाह्माभ्यन्तरे देंदे हथऊध्य च दिक्षुच। 
इत आत्मा तमेद्वात्मा नास्मनात्ममरय जगत ॥ 
: नतदस्ति न यत्राई न तद॒स्ति ,न यन्मयि। 
किमन्यद्मिवाब्छामि: सर्च संविस्मयं ततम्‌ 0 
स्फारबआमलास्थोधिफेनाः.. सर्वेकुलाचहा | 
'चिदादित्यमहातेजों, सगदण्ण जगर्छियः ॥ 





५६ 


रामछी उपासना 


ले 
क्र 





माव्ाशे-- 
कहां जाऊँ १ किसे बोद १ 
किसे ले छू? करूं कया में १ 
में इक तृफान क्यामतका हैँ १ हि 
पुरदैरत तमाशा में ॥ 
नहीं कुछ, जो नहीं मेँ हूँ 
इधर में हूँ, ऊधर मैं हूँ। 
में चाह क्‍या १ किसे हूंडूँ, 
सर्भोर्मे ताना-बाना मैं 0 
में बातिन, में अयां, जेर-उ-जबर, 
अप रास्त, पेश-5-पत, । 
जहां में दर मक्रां में इर जमां, 
हँगा सदा था में ॥ 


दर 
५ (५ 6 
प् 





नन्‍द-अन्थमाला 
इस मालाका उद्देश्य हिम्दीमें छुछूभ मूल्यमें धार्मेक घन्‍्धोंकों प्रकाशित 
करना है। इसमें श्रदतक निम्न लिखित पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।-- 


कर 6 
१--श्रामहगवदगाता 
मूल १६ पेजी अम्बइया टाइपोंमें बडी सुन्दरतासे छापी गयी है। 
अचारकी दृष्टित्रे मूल्य केत्रेक छागतमात्र रक्‍ख्ा गया है। भक्तजनोंको 
मंगाकर अचर्य प्रचार करना चाहिये। जिल्‍्द भ्रह्धित मूल्य |”) 


२--रामायण 
ठुलसीकृत रामचरितमानसका शुद्ध पाठ 

इस पोधीका पाठ संवत्‌ १७११ की खिखी एवं इससे भो पुरानी 
अन्यत्र छपी पोधियोंसि मिलाकर शोधा गया है। ऐसी शुद्ध पोधी इतने 
सस्ते दामोमें ऐसी उत्तम छपाई-बंधाईकी और कही नहीं मिलती | सब 
साधारणके छाभके लिये क्रौर शुद्ध पठके लिये हमने इसका सम्पादन प्रीसद्ध 
विद्वान और साहित्य-मम्मेज्ञ अध्यापक श्री रामदास गोढ़ से कराया दे । 

इसमें आरम्भमें गोसांईओका जाँवनचरित्र भें! है और प्रन्तमें क्रठिन 
शब्दोंका एक कोंष दिया गया दे | २५० पृष्ठका मूल्य केवल लागतमात्त १) 
रक्षमी जिल्द १) 

्ं 
३--वष्णु सहख नास 

नित्य पाठ करनेके योग्य पुस्तक मोटे दाइपमें चित्ों साहिव छापी गयी 

है | दाम केवल लागतमात्र रखा गया है। मूल्य सजित्दका #) सात | 
।₹ 
४--मनुस्मात 

(भाषा-ठौका ) मुस्‍्ठ्वतिकी वडी सरल झुलभ टीका मोटे कागजपछ 

घुल्दर रूपाई तथा मनोइर जिल्द सदित, एृ८ ६६८, मूल्य केवल १0 


सहात्ता गाधोजाक आदेशानुसार राष्टाय 


शिक्षालयोंक लिये संग्रहीत 
अ० रामदास गाड़ एम० ए० द्वारा सम्पादिद 


(कप | ३० प ५. 
श शे 5, 
राष्ट्रीय (शक्षावली 
पहली पोथी-( छेटी ) बच्चोकी अचरज्ञान करानेवाली मूल्य )॥ 
पहली पोर्थी-(बढ़) जिसमें नये. ढइसे अच्रज्ञान फरानेकी रीति 
प्रतायी गयी है । बहुंतसे चित्त भी दिये गये हैँ । प्रृ« ख« ३३ मूल्य #) 
दसरी पोथी---अचरक्षान दोजानेपर पढ़ानेकी पोगी । जीवन- 
बि,पतिद्ाए, नीति और कविताका सचित्त सेग्रह। ४००६४ सिय 
तीसरी पोथी---रष्ट्रीय परठ्शालाओंके अपर प्रोइमरी स्कूलोंमे 
पढ़ानेकी । जिसमें इतिद्ास, जीवनी, नीति, पस्तुपाठ ओर काबिताओंका 
प्रचित संप्रई है। पृ०्स्र*१०६ मूल्य #) | 
चे।धी पेधी--हस पुस्तरुमे शिक्षामद गल्पें, महापुरपेफे जीवन- 
बरित्र, पिशन, नौति, कापि, स्वास्प्यरया, भाणिशाख, उद्योगे-भन्मे 
अरादि बालकीपयेगी विपंयोका सातित पर्णत है | ५० से १४२ मूल्य ॥) 
पांचवी पोथी -राष्ट्राय. प्राव्शाजाओंफी मिडिल, ककाके 
लिये । इसमें स्वाध्प्य सगठन, विशान, आदशे जीबनचॉरित्र, राजनीति, 
म्यन विपयक पाटे। और सुन्दर सुन्दर .नीतिपूण फविताओंका प्त्ुपम 
एचित्र सैध्रद किया गया है । ५६ से २४० मुल्य ॥) 
छटी पोथी--छऊफे पदनेसे विश्ाधियोंको अपना जीवन-श्रादरी 
विक्षेष खदायता मिलती है | प्राचीन खा्दितका पूरा परिचय 
है। अर्थशाछ, छीपनेग्रत्स, विदास और सीठि विषयक 
पेपर हैं। रोचझ रविताओंका सह बड़ी सायधानासे किया 
उनमें भापष्टालिं्ट वर्शन झातीयें मान अरे स्वदेदानंस विपय्क 
ग्म चित सहैय' चंदा है । पृ उे +७% सूह्य १३